Putra Kameshti Yagya

Putra Kameshti Yagya
The Putra Kameshti Yagya is a powerful and sacred Vedic ritual performed to invoke divine blessings for progeny, fulfillment of desires, and overall family well-being. This yagya is primarily performed by couples who wish to be blessed with a child, as well as those who seek to attain spiritual growth, happiness, and prosperity in their family life. The ritual is deeply rooted in ancient scriptures and is known to bring positive changes, prosperity, and harmony into the lives of participants.

This yagya is performed to appease the planetary deities and invoke their blessings for fertility, health, and the well-being of the family. It is especially effective for those facing difficulties in conceiving or desiring to strengthen their family bond.

Benefits of Putra Kameshti Yagya
Progeny Blessings: Helps couples conceive and be blessed with children.
Desire Fulfillment: Fulfills personal and family-related desires, bringing peace and joy.
Spiritual Growth: Promotes spiritual growth, mental peace, and emotional stability.
Family Harmony: Strengthens family bonds, bringing love, understanding, and unity.
Removal of Obstacles: Removes obstacles and barriers in achieving desires and goals.
Improved Fertility: Improves fertility and health, enhancing the well-being of the couple.
How Is Putra Kameshti Yagya Performed?
Space Cleansing: The area is purified using sacred mantras and offerings to prepare for the sacred rituals.
Invocation of Gods: Chanting of sacred hymns and mantras to invoke the blessings of Lord Vishnu, Lord Shiva, and other deities for a healthy progeny.
Mantra Chanting: The main mantras of the Putra Kameshti Yagya are recited continuously to attract divine blessings for fertility and progeny.
Offerings to Fire: Offerings such as ghee, grains, and herbs are made into the sacred fire to energize the atmosphere.
Prayers for Family Welfare: Prayers are offered for overall family happiness, prosperity, and the health of future generations.
Prasad and Blessings: After completing the yagya, prasad (blessed offerings) is distributed to all participants, followed by the aarti to seek divine protection

वास्तु पूजा – संपूर्ण विधि

🪷 श्री गुरुदेव दत्त 🪷

💢 वास्तु पूजा – संपूर्ण विधि 💢

ये पूजा हर घर, दुकान, फैक्ट्री के लिए प्राण है।

1. वास्तु पूजा कब और कितने दिन?

मुख्य वास्तु शांति – 1 दिन की होती है – गृह प्रवेश के दिन।
पर शास्त्र में 3 प्रकार है

साधारण 1 दिन – नये घर में प्रवेश पर
मध्यम 3 दिन – जहाँ जमीन में दोष हो, बोरवेल गलत हो, कोई अशुभ घटना हुई हो
उत्तम 5 दिन तक – मंदिर, बड़ा मकान, फैक्ट्री, जहाँ तहखाना, कुआँ दबा हो

सबसे शुभ नक्षत्र उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, धनिष्ठा, शतभिषा – और मंगल-शनि छोड़कर कोई भी दिन।
समय सुबह 8 से 12

2. सामग्री

ईंट / शिला 5, वास्तु यंत्र तांबे का, नाग-नागिन चांदी के, सप्तधान्य (7 अनाज), गंगाजल, पंचगव्य, कलश 1, हवन सामग्री, लाल कपड़ा, कील 4 लोहे की

3. पूजा विधि – Step by Step

Step 1 – भूमि शोधन
जहाँ पूजा करनी है, गोबर से लीपें। फिर गंगाजल + गोमूत्र छिड़कें।

मंत्र ॐ वास्तु पुरुषाय नमः

Step 2 – वास्तु पुरुष का निर्माण
बीच में चावल से चौकोर बनाएं। उस पर वास्तु पुरुष की आकृति – सिर ईशान (उत्तर-पूर्व), पैर नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में।

Step 3 – कलश स्थापना
ईशान कोने में कलश रखें, उसमें सिक्का, सुपारी। कलश पर वास्तु यंत्र रखें।

Step 4 – 5 देव पूजा

  1. गणेश – विघ्न हरण
  2. वरुण – जल शुद्धि
  3. नवग्रह – 9 ग्रहों की शांति
  4. वास्तु पुरुष – मुख्य देव
  5. क्षेत्रपाल – जमीन के रक्षक

मंत्र – ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥ ऋग्वेद का वास्तु मंत्र

Step 5 – हवन
108 आहुति – तिल + घी + जौ से ॐ वास्तु पुरुषाय स्वाहा

Step 6 – नींव में स्थापना (सबसे जरूरी)
एक छोटा गड्ढा आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) में खोदें। उसमें
👉तांबे का वास्तु यंत्र
👉चांदी के नाग-नागिन
👉7 अनाज
👉1 ईंट
रखकर ऊपर से सीमेंट कर दें। यही घर का प्राण-स्थापन है।

4. कितने दिन पूजा घर में करनी है?

वास्तु शांति 1 दिन ही होती है, पर उसके बाद
21 दिन तक रोज वास्तु पुरुष को धूप-दीपक दिखाएं
👉जहाँ नाग दबाए हैं वहाँ रोज 1 लोटा जल
👉1 साल तक उस जगह पर जूता-चप्पल न रखें

5. लाभ

👉घर में लड़ाई, बीमारी, पैसे का न रुकना बंद होता है
👉किराये वाला घर अपना बनता है
👉फैक्ट्री में मशीनरी नहीं टूटती

6. सावधानी

  1. वास्तु पूजा मंगल और शनिवार को न करें
  2. वास्तु यंत्र को लोहे पर न रखें, तांबे पर ही
  3. पूजा के दिन घर के सभी सदस्य उपस्थित रहें, सूतक में न करें

भाव वास्तु पूजा ईंट की पूजा नहीं, उस अदृश्य पुरुष की पूजा है जो हमारी जमीन पर लेटा है – उसे जगाकर कह रहे हैं “अब आप इस घर की रक्षा करो”

शुक्र — रिश्ते टूटने के बाद भी मन उसी व्यक्ति के पास क्यों लौटता है।

शुक्र — रिश्ते टूटने के बाद भी मन उसी व्यक्ति के पास क्यों लौटता है।

कभी कभी कोई व्यक्ति हमारी जिंदगी से चला जाता है लेकिन हमारे भीतर से नहीं जाता। बात खत्म हो जाती है लेकिन मन में बातचीत चलती रहती है। रिश्ता खत्म हो जाता है लेकिन इंतजार खत्म नहीं होता। फोन हाथ में आता है और अनजाने में उसी नाम को देखने का मन करता है। कोई पुरानी तस्वीर सामने आ जाती है तो आंखें नम हो जाती हैं। कोई गीत बजता है और लगता है जैसे वह इंसान अभी यहीं कहीं है। हम खुद से कहते हैं कि अब बहुत समय हो गया है फिर भी दिल मानता नहीं। सबसे अजीब बात यह होती है कि हम उस व्यक्ति को भूलना भी चाहते हैं और भीतर कहीं यह भी चाहते हैं कि वह वापस आए। आखिर ऐसा क्यों होता है। क्या यह केवल आदत है। क्या यह केवल मोह है। या कुछ रिश्ते सचमुच इतने गहरे होते हैं कि उनके टूट जाने के बाद भी उनका संबंध भीतर कहीं बना रहता है। ज्योतिष की कर्मिक दृष्टि से यही वह जगह है जहाँ शुक्र की कहानी शुरू होती है।

शुक्र केवल प्रेम का ग्रह नहीं है। शुक्र उस अनुभूति का भी ग्रह है जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहकर हमें अपने भीतर कुछ पूरा महसूस होता है। इसलिए जब कोई रिश्ता टूटता है तो हमेशा व्यक्ति ही नहीं जाता। उसके साथ हमारे जीवन का एक हिस्सा भी चला जाता है। जिस समय वह हमारे साथ था तब हम अपने आपको जिस रूप में देखते थे वह रूप भी उसके साथ जुड़ गया था। उसकी आवाज हमारी खुशी से जुड़ गई। उसका इंतजार हमारी दिनचर्या से जुड़ गया। उसकी मौजूदगी हमारी सुरक्षा से जुड़ गई। इसलिए रिश्ता टूटने के बाद मन केवल उस व्यक्ति को नहीं खोजता। वह उस अपने रूप को भी खोजता है जो उस व्यक्ति के साथ रहते हुए पैदा हुआ था। यही कारण है कि कुछ लोग वर्षों बाद भी भीतर से उसी व्यक्ति की ओर लौटते रहते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर मैं आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा। शायद क्योंकि कुछ संबंध केवल वर्तमान की घटना नहीं होते। वे हमारे भीतर बहुत पुरानी किसी स्मृति या संस्कार को छू देते हैं।

कर्मिक ज्योतिष में राहु और केतु को जन्म जन्मांतर की धुरी के रूप में देखा जाता है। पंचम भाव को पूर्व संस्कार और पूर्व पुण्य से जोड़ा जाता है। अष्टम भाव गहरे बंधन परिवर्तन और उन अनुभवों की ओर संकेत कर सकता है जो व्यक्ति को भीतर तक बदल देते हैं। द्वादश भाव त्याग और उस पकड़ को दिखा सकता है जिससे मुक्त होना सीखना पड़ता है। जब शुक्र का इन क्षेत्रों या ग्रहों से गहरा संबंध बनता है तब प्रेम की कहानी केवल आकर्षण तक सीमित नहीं रहती। वहां एक ऐसी अनुभूति दिखाई दे सकती है जिसमें व्यक्ति को लगता है कि यह रिश्ता नया होकर भी नया नहीं है। जैसे सामने वाले को पहली बार देखकर भी मन कह रहा हो कि मैं इसे पहले से जानता हूँ। जैसे उसकी आवाज में कोई पुरानी पहचान छिपी हो। जैसे उसके साथ कुछ अधूरा रह गया हो और मन बिना कारण उसी अधूरेपन को पूरा करना चाहता हो। इसे निश्चित रूप से पिछले जन्म का प्रमाण नहीं कहा जा सकता लेकिन कर्मिक ज्योतिष की भाषा में इसे पूर्व संस्कार की गहरी प्रतिध्वनि के रूप में समझा जा सकता है।

शायद इसी कारण कुछ रिश्ते जीवन में आते ही साधारण नहीं लगते। मुलाकात छोटी होती है लेकिन असर बहुत बड़ा होता है। साथ कम मिलता है लेकिन याद बहुत लंबे समय तक रहती है। कभी कभी दो लोग बहुत कम समय साथ रहते हैं फिर भी उनमें से कोई एक दूसरे के जीवन पर वर्षों तक छाया रहता है। वहीं कुछ रिश्ते वर्षों तक चलते हैं लेकिन भीतर कोई ऐसी गहराई पैदा नहीं होती। यह अंतर केवल समय से नहीं समझाया जा सकता। शुक्र जब किसी गहरे कर्मिक संकेत से जुड़ता है तब आकर्षण केवल शरीर का नहीं रहता। व्यक्ति के भीतर एक अजीब खिंचाव पैदा हो सकता है। सामने वाला दूर चला जाए तो मन उसे छोड़ने के बजाय और ज्यादा महसूस करने लगता है। आप उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि यह रिश्ता खत्म हो गया लेकिन हृदय कहता है कि कहानी अभी पूरी नहीं हुई। शायद इसी को लोग आत्मिक कनेक्शन कहते हैं। और शायद इसी कारण कुछ प्रेम कहानियां पूरी होकर भी पूरी नहीं लगतीं।

लेकिन यहां एक बहुत सुंदर और कठिन बात समझनी होगी। किसी व्यक्ति का आपकी जिंदगी में लौटना हमेशा जरूरी नहीं होता। कभी कभी उसका लौटना किसी बाहरी रूप में नहीं बल्कि आपके भीतर होता है। उसकी याद आपको बदलती है। उसके साथ बिताया समय आपको प्रेम समझाता है। उसका जाना आपको अपने भीतर की कमजोरी दिखाता है। उसकी चुप्पी आपको अपनी अपेक्षाओं से मिलाती है। उसका प्रेम आपको बताता है कि आप कितना गहरा महसूस कर सकते हैं। उसका दूर जाना आपको बताता है कि आपके भीतर कितना धैर्य है। इसलिए कर्मिक संबंध का अर्थ केवल यह नहीं कि दोनों लोग फिर से मिलेंगे। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उस संबंध ने आपके भीतर कोई ऐसा अध्याय खोल दिया जिसे इस जन्म में पूरा समझना था। शायद इसी वजह से कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे भीतर अपना काम करते रहते हैं।

शुक्र की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि प्रेम और आसक्ति के बीच का अंतर समझा जाए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर गहरे प्रेम को तुरंत छोड़ देना चाहिए। नहीं। कुछ संबंधों को समय चाहिए। कुछ रिश्तों को संवाद चाहिए। कुछ को क्षमा चाहिए। कुछ को प्रतीक्षा चाहिए। और कुछ संबंध ऐसे भी होते हैं जिनकी कहानी परिस्थितियों के बदलने के बाद फिर किसी दूसरे मोड़ पर सामने आ सकती है। कर्म का रहस्य हम पूरी तरह नहीं जानते। इसलिए किसी गहरे संबंध को केवल इसलिए खारिज कर देना कि वह कठिन है भी उचित नहीं। यदि हृदय बार बार उसी व्यक्ति की ओर लौटता है तो पहले अपने भीतर यह देखना चाहिए कि वह लौटना किस कारण है। क्या वहां प्रेम है। क्या वहां अधूरापन है। क्या वहां कोई अनकहा सत्य है। क्या कोई क्षमा बाकी है। क्या कोई वचन अधूरा है। या क्या उस व्यक्ति के माध्यम से जीवन हमें अपने ही किसी गहरे हिस्से से मिलवा रहा है। उत्तर हर व्यक्ति की कुंडली और जीवन की परिस्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

और कभी कभी सबसे दर्दनाक बात यह होती है कि दोनों लोग एक दूसरे को प्रेम करते हैं फिर भी परिस्थितियां उन्हें साथ नहीं रहने देतीं। समय सही नहीं होता। परिवार बीच में आ जाते हैं। दूरी आ जाती है। अहंकार आ जाता है। गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं। कोई एक डर जाता है। कोई एक चुप हो जाता है। और फिर दोनों अपनी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं लेकिन भीतर एक जगह खाली रह जाती है। वर्षों बाद अचानक कोई स्मृति आती है और हृदय फिर उसी जगह खड़ा हो जाता है जहाँ कहानी अधूरी रह गई थी। शायद यही वह क्षण है जहाँ मनुष्य समझता है कि प्रेम हमेशा प्राप्ति का नाम नहीं है। कभी कभी प्रेम वह अनुभव है जो हमें हमारी आत्मा की गहराई तक ले जाता है। कोई व्यक्ति हमारे साथ रहे या न रहे यह जीवन के हाथ में हो सकता है लेकिन उसने हमारे भीतर जो प्रेम जगा दिया वह हमेशा हमारे साथ रह सकता है।

इसलिए अगर आपका मन आज भी किसी ऐसे व्यक्ति के पास लौटता है जिससे आपका रिश्ता टूट चुका है तो अपने मन को तुरंत गलत मत कहिए। यह जरूरी नहीं कि आप कमजोर हैं। यह भी जरूरी नहीं कि आप केवल भ्रम में हैं। हो सकता है आपके भीतर कोई पुरानी स्मृति जीवित हो। हो सकता है कोई अधूरा भाव हो। हो सकता है उस व्यक्ति ने आपके जीवन में ऐसा संस्कार छोड़ दिया हो जो अभी समझ में आना बाकी है। और कर्मिक ज्योतिष की भाषा में हो सकता है कि वह संबंध आपके लिए किसी पुराने अध्याय की प्रतिध्वनि हो।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आपको अपने जीवन को रोक देना चाहिए। प्रेम को महसूस करना और अपने जीवन को जीना एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कभी कभी मन उसी व्यक्ति के पास लौटता रहेगा और फिर भी जीवन आगे बढ़ता रहेगा। समय के साथ उस लौटने का अर्थ बदल सकता है। आज जो दर्द है वही कल समझ बन सकता है।
शायद इसीलिए कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते। वे आते हैं और हमारे भीतर कुछ ऐसा जगा जाते हैं जो पहले सोया हुआ था। वे हमें बताते हैं कि हम कितना प्रेम कर सकते हैं। कितना इंतजार कर सकते हैं। कितना टूट सकते हैं। और टूटने के बाद भी हमारे भीतर प्रेम बचा रह सकता है। शायद यही कर्म की सबसे गहरी सुंदरता है। हमें हर जन्म की पूरी कहानी याद नहीं रहती लेकिन कुछ भाव बिना नाम के हमारे साथ चलते रहते हैं। किसी चेहरे से अचानक अपनापन। किसी आवाज से अजीब शांति। किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसका मन में बने रहना। इन सबको हम निश्चित रूप से पूर्व जन्म नहीं कह सकते लेकिन इनके भीतर छिपे अर्थ को महसूस जरूर कर सकते हैं।

और शायद किसी दिन वह व्यक्ति फिर आपके सामने आए। शायद नहीं आए। यह भविष्य कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता। लेकिन यदि वह रिश्ता आपके जीवन में सचमुच किसी गहरे कर्मिक पाठ की तरह आया था तो उसका उद्देश्य केवल मिलना नहीं था। उसका उद्देश्य आपको बदलना भी हो सकता है। इसलिए उस प्रेम को केवल अपने दर्द के रूप में मत देखिए। उसे अपनी आत्मा के एक अध्याय की तरह देखिए। जिसने आपको रुलाया वही आपको गहराई दे गया। जिसने आपको इंतजार कराया उसने आपको धैर्य सिखाया। जिसने आपको छोड़ा उसने आपको अपने भीतर लौटना सिखाया। और जिसने आपको प्रेम दिया उसने आपको यह बताया कि आपका हृदय कितना विशाल है।

शुक्र शायद इसी रहस्य का ग्रह है। वह केवल यह नहीं बताता कि आपके जीवन में प्रेम आएगा या नहीं। वह यह भी दिखाता है कि प्रेम आपके भीतर क्या जगाने आया है।
और कभी कभी जिस व्यक्ति से रिश्ता टूट जाता है उसके साथ संबंध बाहर से समाप्त हो जाता है लेकिन भीतर उसकी कहानी चलती रहती है।शायद इसलिए नहीं कि आप कमजोर हैं।
शायद इसलिए कि कुछ रिश्ते समय से नहीं मापे जाते।

कुछ रिश्ते अपने भीतर छोड़ी हुई छाप से मापे जाते हैं।
और कर्मिक ज्योतिष की दृष्टि से शायद कुछ प्रेम ऐसे भी होते हैं जिनकी शुरुआत इस जन्म में दिखाई देती है लेकिन उनकी जड़ें किसी बहुत पुराने संस्कार तक जाती हुई महसूस होती हैं।
कौन जानता है कितने जन्म पहले कौन किससे क्या कहकर बिछड़ा था।कौन जानता है कौन सा वचन अधूरा रह गया था।
कौन जानता है कौन सा प्रेम समय के पार भी अपनी पहचान बचाकर बैठा है।
लेकिन इतना जरूर है कि जब कोई व्यक्ति बिना सामने हुए भी आपके भीतर इतनी गहराई से मौजूद हो तो उस भावना को समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।
क्योंकि हो सकता है वह केवल किसी इंसान की याद न हो।
हो सकता है वह आपकी आत्मा के किसी पुराने अध्याय की दस्तक हो।

शुक्र सूत्रम्
सूत्र १
शुक्र जहाँ बैठता है वहाँ सुख की इच्छा नहीं, सुख की भूख दिखाई देती है।
सूत्र २
शुक्र जिस ग्रह से जुड़ता है, प्रेम उसी ग्रह का रंग और कर्म पहन लेता है।
सूत्र ३
राहु से जुड़ा शुक्र कई बार व्यक्ति से नहीं, उसकी बनाई हुई कल्पना से प्रेम करवाता है।
सूत्र ४
केतु से जुड़ा शुक्र प्रेम के बीच भी एक ऐसी दूरी रखता है जिसे मन स्वयं नहीं समझ पाता।
सूत्र ५
अष्टम से जुड़ा शुक्र सुख नहीं छिपाता, सुख के पीछे छिपी आसक्ति को खोल देता है।
सूत्र ६
द्वादश से जुड़ा शुक्र पूछता है—प्रेम में तुमने पाया कितना और स्वयं को खोया कितना?
सूत्र ७
पंचम से जुड़ा शुक्र आकर्षण देता है, लेकिन अष्टम से जुड़ते ही आकर्षण अनुभव बन जाता है।
सूत्र ८
शुक्र की परीक्षा सुख मिलने में नहीं, सुख मिलने के बाद उससे मुक्त रहने में है।
सूत्र ९
जिसे आँखें सुंदर समझती हैं वह जरूरी नहीं कि जीवन के लिए सही हो। शुक्र आकर्षण दिखाता है, विवेक चयन करता है।
सूत्र १०
शुक्र का अंतिम रहस्य यही है—सच्चा प्रेम वह है जिसमें प्रेम रहे, लेकिन अधिकार समाप्त हो जाए।

पंचक

चालू पंचक कल दोपहर से शुरू हो चुका है और यह 1 सितंबर 2026, मंगलवार की सुबह 03:24 बजे तक प्रभावी रहेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह पंचक 27 अगस्त 2026, गुरुवार को दोपहर 01:35 बजे शुरू हुआ है। गुरुवार से शुरू होने के कारण इसे शास्त्रों में ‘शुभ/दोषरहित पंचक’ या सामान्य पंचक माना जाता है, जिसमें कुछ विशेष पारंपरिक वर्जित कार्यों को छोड़कर अन्य सामान्य काम किए जा सकते हैं।

जमीन की रजिस्ट्री और पंचक
जरूरी मार्गदर्शनयदि आप जमीन या किसी भी प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री करवाने जा रहे हैं, तो इन मुख्य बातों का ध्यान रखें
1. क्या पंचक में रजिस्ट्री कराई जा सकती है?हाँ, कराई जा सकती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, पंचक के दौरान केवल 5 विशेष कार्य वर्जित होते हैं
दक्षिण दिशा की यात्रा करना, घर की छत (लेंटर) डालना, लकड़ी या ईंधन इकट्ठा करना, घास/कबाड़ जमा करना, और पलंग या चारपाई बुनना/खरीदना।
इन नियमों में जमीन या मकान की रजिस्ट्री पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं है

2. इस पंचक की विशेषता
चूंकि यह पंचक गुरुवार से शुरू हुआ है, इसलिए इसे ज्योतिषीय गणनाओं में बहुत अधिक हानिकारक या अशुभ नहीं माना गया है। यदि सरकारी दफ्तर (रजिस्ट्रार ऑफिस) खुला है और आपके दस्तावेज तैयार हैं, तो आप रजिस्ट्री की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं।

3. रजिस्ट्री के लिए अन्य महत्वपूर्ण सावधानियां

भले ही पंचक बाधक न हो, लेकिन हिंदू धर्म और ज्योतिष के अनुसार भूमि से जुड़े बड़े सौदों में कुछ अन्य बातों को टालना बेहतर माना जाता है

राहुकाल
जिस दिन आप रजिस्ट्री दफ्तर जाएं, उस दिन के राहुकाल (रोज का करीब 1.5 घंटे का अशुभ समय) के दौरान मुख्य हस्ताक्षर या पैसों का लेनदेन करने से बचें।

अमावस्या या ग्रहण
यदि उस अवधि में अमावस्या तिथि या कोई सूर्य/चंद्र ग्रहण पड़ रहा हो, तो भी रजिस्ट्री टालनी चाहिए

नवग्रहों को प्रसन्न करने के सूक्ष्म रहस्य – खोलें

🌟 नवग्रहों को प्रसन्न करने के सूक्ष्म रहस्य – खोलें अपनी तकदीर का ताला! 🌟

क्या आप जानते हैं कि आपके जीवन की हर खुशी, हर चुनौती के पीछे नवग्रहों की अदृश्य शक्ति काम करती है? 🌌
सूर्य का तेज, चंद्र की शांति, मंगल का जोश, या शनि की कठोर नजर – ये नौ ग्रह आपके भाग्य को आकार देते हैं।

लेकिन इन ग्रहों को प्रसन्न करने के तांत्रिक और ज्योतिषीय रहस्य आपके जीवन को सुख, समृद्धि और सफलता से भर सकते हैं! 🕉️

नवग्रहों के गूढ़ उपाय, जो हर साधक को जानना चाहिए! ✨

1️⃣ सूर्य: तेज और सम्मान का स्वामी
सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए सुबह सूर्योदय के समय आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और गुड़ डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। यह उपाय आत्मविश्वास और यश दिलाएगा! 🌞

2️⃣ चंद्र: मन की शांति का कारक
मन अशांत है? हर सोमवार को शिवलिंग पर दूध और शहद से अभिषेक करें। ॐ नमः शिवाय का 108 बार जाप करें। चंद्रमा की कृपा से मन शांत और विचार स्पष्ट होंगे। 🌙

3️⃣ मंगल: साहस और शक्ति का ग्रह
मंगल की अशुभता से परेशान हैं? मंगलवार को हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ करें और लाल मसूर की दाल का दान करें। यह उपाय शत्रुओं पर विजय और साहस देगा! 🛕

4️⃣ बुध: बुद्धि और वाणी का स्वामी
बुधवार को गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें और हरी मूंग दाल का दान करें। तुलसी के पौधे को जल अर्पित करें। बुध की कृपा से व्यापार और पढ़ाई में सफलता मिलेगी! 🌿

5️⃣ गुरु: ज्ञान और समृद्धि का दाता
गुरुवार को विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और चने की दाल या पीली वस्तु का दान करें। बृहस्पति की कृपा से धन, ज्ञान और सुख की प्राप्ति होगी! 📿

6️⃣ शुक्र: सौंदर्य और ऐश्वर्य का कारक
शुक्रवार को लक्ष्मी सूक्त का पाठ करें और सफेद मिठाई या इत्र का दान करें। शुक्र की कृपा से वैवाहिक सुख और विलासिता प्राप्त होगी! 💎

7️⃣ शनि: कर्म और न्याय का स्वामी
शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार को शनि चालीसा का पाठ करें और काले तिल या सरसों का तेल दान करें। पीपल के नीचे दीपक जलाएँ। शनि की कृपा से हर बाधा दूर होगी! 🪔

8️⃣ राहु: रहस्य और भ्रम का ग्रह
राहु की अशुभता दूर करने के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और काले कपड़े में कोयला बाँधकर बहते जल में प्रवाहित करें। राहु की कृपा से छल-कपट से मुक्ति मिलेगी! 🖤

9️⃣ केतु: मोक्ष और आध्यात्म का दाता
केतु को प्रसन्न करने के लिए महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें और कंबल या सात अनाज का दान करें। केतु की कृपा से आध्यात्मिक उन्नति और बाधाओं से मुक्ति मिलेगी! 🕉️

🔥 सर्वग्रह शांति का तांत्रिक रहस्य! 🔥
सभी ग्रहों को एक साथ प्रसन्न करने के लिए नवग्रह यंत्र की स्थापना करें। इसे पूजा स्थान पर रखें और रोज सुबह “नवग्रह तीव्र सिद्धि मंत्र” का 108 बार जाप करें। यह तांत्रिक साधना आपकी कुंडली की हर अशुभता को दूर कर देगी! 🌠

ये उपाय सरल हैं, लेकिन इनमें छिपी है ब्रह्मांडीय शक्ति! आज से शुरू करें और देखें कैसे चमत्कार आपके जीवन में उतरते हैं। 🪐

सभी ९ ग्रहों को एक साथ शांत रखने, जीवन की बाधाओं को दूर करने

📿✅सभी ९ ग्रहों को एक साथ शांत रखने, जीवन की बाधाओं को दूर करने और उन्नति (तरक्की) के लिए ज्योतिष शास्त्र में महादेव शिव की आराधना को सर्वश्रेष्ठ और अचूक उपाय माना गया है। शिवजी को नवग्रहेश्वर (नौ ग्रहों के स्वामी) कहा जाता है, इसलिए उनकी पूजा से सभी ग्रह-नक्षत्र अनुकूल फल देने लगते हैं।

🙇जीवन में सुख-समृद्धि लाने और हर संकट से बचने के लिए आप महा-उपाय अपना सकते हैं

१. महा-उपाय,नवग्रह अन्न से शिवलिंग का अभिषेकयदि आपके पास कुंडली नहीं है या आप नहीं जानते कि कौन सा ग्रह परेशान कर रहा है, तो यह एक उपाय सभी ९ ग्रहों को शांत कर देता है

विधि: ९ अलग-अलग अनाज बराबर मात्रा में मिलाकर एक डिब्बे में रख लें।
सूर्य के लिए,गेहूं
चंद्रमा के लिए,चावल
मंगल के लिए, मसूर की दाल
बुध के लिए, हरी मूंग
बृहस्पति के लिए, चने की दाल
शुक्र के लिए,सफेद ज्वार
शनि के लिए, काली उड़द
राहु के लिए,जौ
केतु के लिए,काले तिल

नियम👇
रोज सुबह (या हर सोमवार को) इस मिश्रण में से एक मुट्ठी अनाज लेकर तांबे या लोटे के जल के साथ शिवलिंग पर अर्पित करें। इससे सभी ग्रह दोष धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं और अटके हुए काम बनने लगते हैं।

२. दैनिक आदतें (जो ग्रहों को मजबूत बनाती हैं)ग्रहों को शांत रखने के लिए महंगे अनुष्ठानों की नहीं, बल्कि सही दिनचर्या की जरूरत होती है

सूर्य (सम्मान और करियर) रोज सुबह उठकर तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल (अर्घ्य) दें।
बृहस्पति (ज्ञान और धन) भोजन में हल्दी का प्रयोग करें और माथे पर चंदन या केसर का तिलक लगाएं।

शनि और राहु (बाधाएं और नुकसान),किसी गरीब, लाचार व्यक्ति या सफाई कर्मचारी की मदद करें। शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

जीव सेवा,रोज सुबह पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी काले कुत्ते को दें। पक्षियों को दाना डालें। यह उपाय राहु-केतु और शनि के बुरे प्रभाव को तुरंत खत्म करता है।

३. सर्व-कल्याणकारी मंत्ररोज सुबह या शाम को “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम १०८ बार (१ माला) जाप करें। यह मंत्र जीवन में सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है

शनिदेव और रोजगार

शनिदेव और रोजगार
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शनि को सन्तुलन और न्याय का ग्रह माना गया है। जो लोग अनुचित बातों के द्वारा अपनी चलाने की कोशिश करते हैं, जो बात समाज के हित में नही होती है और उसको मान्यता देने की कोशिश करते है, अहम के कारण अपनी ही बात को सबसे आगे रखते हैं, अनुचित विषमता, अथवा अस्वभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि उनको ही पीडित करता है। शनि हमसे कुपित न हो, उससे पहले ही हमे समझ लेना चाहिये, कि हम कहीं अन्याय तो नही कर रहे हैं, या अनावश्यक विषमता का साथ तो नही दे रहे हैं। यह तपकारक ग्रह है, अर्थात तप करने से शरीर परिपक्व होता है, शनि का रंग गहरा नीला होता है, शनि ग्रह से निरंतर गहरे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर गिरती रहती हैं। शरी में इस ग्रह का स्थान उदर और जंघाओं में है। सूर्य पुत्र शनि दुख दायक, शूद्र वर्ण, तामस प्रकृति, वात प्रकृति प्रधान तथा भाग्य हीन नीरस वस्तुओं पर अधिकार रखता है। शनि सीमा ग्रह कहलाता है, क्योंकि जहां पर सूर्य की सीमा समाप्त होती है, वहीं से शनि की सीमा शुरु हो जाती है। जगत में सच्चे और झूठे का भेद समझना, शनि का विशेष गुण है। यह ग्रह कष्टकारक तथा दुर्दैव लाने वाला है। विपत्ति, कष्ट, निर्धनता, देने के साथ साथ बहुत बडा गुरु तथा शिक्षक भी है, जब तक शनि की सीमा से प्राणी बाहर नही होता है, संसार में उन्नति सम्भव नही है। शनि जब तक जातक को पीडित करता है, तो चारों तरफ़ तबाही मचा देता है। जातक को कोई भी रास्ता चलने के लिये नही मिलता है। करोडपति को भी खाकपति बना देना इसकी सिफ़्त है। अच्छे और शुभ कर्मों बाले जातकों का उच्च होकर उनके भाग्य को बढाता है, जो भी धन या संपत्ति जातक कमाता है, उसे सदुपयोग मे लगाता है। गृहस्थ जीवन को सुचारु रूप से चलायेगा.साथ ही धर्म पर चलने की प्रेरणा देकर तपस्या और समाधि आदि की तरफ़ अग्रसर करता है। अगर कर्म निन्दनीय और क्रूर है, तो नीच का होकर भाग्य कितना ही जोडदार क्यों न हो हरण कर लेगा, महा कंगाली सामने लाकर खडी कर देगा, कंगाली देकर भी मरने भी नही देगा, शनि के विरोध मे जाते ही जातक का विवेक समाप्त हो जाता है। निर्णय लेने की शक्ति कम हो जाती है, प्रयास करने पर भी सभी कार्यों मे असफ़लता ही हाथ लगती है। स्वभाव मे चिडचिडापन आजाता है, नौकरी करने वालों का अधिकारियों और साथियों से झगडे, व्यापारियों को लम्बी आर्थिक हानि होने लगती है। विद्यार्थियों का पढने मे मन नही लगता है, बार बार अनुत्तीर्ण होने लगते हैं। जातक चाहने पर भी शुभ काम नही कर पाता है। दिमागी उन्माद के कारण उन कामों को कर बैठता है जिनसे करने के बाद केवल पछतावा ही हाथ लगता है। शरीर में वात रोग हो जाने के कारण शरीर फ़ूल जाता है, और हाथ पैर काम नही करते हैं, गुदा में मल के जमने से और जो खाया जाता है उसके सही रूप से नही पचने के कारण कडा मल बन जाने से गुदा मार्ग में मुलायम भाग में जख्म हो जाते हैं, और भगन्दर जैसे रोग पैदा हो जाते हैं। एकान्त वास रहने के कारण से सीलन और नमी के कारण गठिया जैसे रोग हो जाते हैं, हाथ पैर के जोडों मे वात की ठण्डक भर जाने से गांठों के रोग पैदा हो जाते हैं, शरीर के जोडों में सूजन आने से दर्द के मारे जातक को पग पग पर कठिनाई होती है। दिमागी सोचों के कारण लगातार नशों के खिंचाव के कारण स्नायु में दुर्बलता आजाती है। अधिक सोचने के कारण और घर परिवार के अन्दर क्लेश होने से विभिन्न प्रकार से नशे और मादक पदार्थ लेने की आदत पड जाती है, अधिकतर बीडी सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से क्षय रोग हो जाता है, अधिकतर अधिक तामसी पदार्थ लेने से कैंसर जैसे रोग भी हो जाते हैं। पेट के अन्दर मल जमा रहने के कारण आंतों के अन्दर मल चिपक जाता है, और आंतो मे छाले होने से अल्सर जैसे रोग हो जाते हैं। शनि ऐसे रोगों को देकर जो दुष्ट कर्म जातक के द्वारा किये गये होते हैं, उन कर्मों का भुगतान करता है। जैसा जातक ने कर्म किया है उसका पूरा पूरा भुगतान करना ही शनिदेव का कार्य है। शनि की मणि नीलम है। प्राणी मात्र के शरीर में लोहे की मात्रा सब धातुओं से अधिक होती है, शरीर में लोहे की मात्रा कम होते ही उसका चलना फ़िरना दूभर हो जाता है। और शरीर में कितने ही रोग पैदा हो जाते हैं। इसलिये ही इसके लौह कम होने से पैदा हुए रोगों की औषधि खाने से भी फ़ायदा नही हो तो जातक को समझ लेना चाहिये कि शनि खराब चल रहा है। शनि मकर तथा कुम्भ राशि का स्वामी है। इसका उच्च तुला राशि में और नीच मेष राशि में अनुभव किया जाता है। इसकी धातु लोहा, अनाज चना, और दालों में उडद की दाल मानी जाती है।

शनि सम्बन्धी व्यापार और नौकरी
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काले रंग की वस्तुयें, लोहा, ऊन, तेल, गैस, कोयला, कार्बन से बनी वस्तुयें, चमडा, मशीनों के पार्ट्स, पेट्रोल, पत्थर, तिल और रंग का व्यापार शनि से जुडे जातकों को फ़ायदा देने वाला होता है। चपरासी की नौकरी, ड्राइवर, समाज कल्याण की नौकरी नगर पालिका वाले काम, जज, वकील, राजदूत आदि वाले पद शनि की नौकरी मे आते हैं।

कुंडली मे शनि की पहचान
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जातक को अपने जन्म दिनांक को देखना चाहिये, यदि शनि चौथे, छठे, आठवें, बारहवें भाव मे किसी भी राशि में विशेषकर नीच राशि में बैठा हो, तो निश्चित ही आर्थिक, मानसिक, भौतिक पीडायें अपनी महादशा, अन्तर्दशा, में देगा, इसमे कोई सन्देह नही है, समय से पहले यानि महादशा, अन्तर्दशा, आरम्भ होने से पहले शनि के बीज मंत्र का अवश्य जाप कर लेना चाहिये.ताकि शनि प्रताडित न कर सके, और शनि की महादशा और अन्तर्दशा का समय सुख से बीते.याद रखें अस्त शनि भयंकर पीडादायक माना जाता है, चाहे वह किसी भी भाव में क्यों न हो।

अंकशास्त्र में शनि
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ज्योतिष विद्याओं मे अंक विद्या भी एक महत्व पूर्ण विद्या है, जिसके द्वारा हम थोडे समय में ही प्रश्न कर्ता का स्पष्ट उत्तर दे सकते हैं, अंक विद्या में ८ का अंक शनि को प्राप्त हुआ है। शनि परमतपस्वी और न्याय का कारक माना जाता है, इसकी विशेषता पुराणों में प्रतिपादित है। आपका जिस तारीख को जन्म हुआ है, गणना करिये, और योग अगर ८ आये, तो आपका अंकाधिपति शनिश्चर ही होगा.जैसे-८,१७,२६ तारीख आदि.यथा-१७=१+७=८,२६=२+६=८.

अंक आठ की ज्योतिषीय परिभाषा
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अंक आठ वाले जातक धीरे धीरे उन्नति करते हैं, और उनको सफ़लता देर से ही मिल पाती है। परिश्रम बहुत करना पडता है, लेकिन जितना किया जाता है उतना मिल नही पाता है, जातक वकील और न्यायाधीश तक बन जाते हैं, और लोहा, पत्थर आदि के व्यवसाय के द्वारा जीविका भी चलाते हैं। दिमाग हमेशा अशान्त सा ही रहता है, और वह परिवार से भी अलग ही हो जाता है, साथ ही दाम्पत्य जीवन में भी कटुता आती है। अत: आठ अंक वाले व्यक्तियों को प्रथम शनि के विधिवत बीज मंत्र का जाप करना चाहिये.तदोपरान्त साढे पांच रत्ती का नीलम धारण करना चाहिये.ऐसा करने से जातक हर क्षेत्र में उन्नति करता हुआ, अपना लक्ष्य शीघ्र प्राप्त कर लेगा.और जीवन में तप भी कर सकेगा, जिसके फ़लस्वरूप जातक का इहलोक और परलोक सार्थक होंगे. शनि प्रधान जातक तपस्वी और परोपकारी होता है, वह न्यायवान, विचारवान, तथा विद्वान भी होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है, शान्त स्वभाव होता है, और वह कठिन से कठिन परिस्थति में अपने को जिन्दा रख सकता है। जातक को लोहा से जुडे वयवसायों मे लाभ अधिक होता है। शनि प्रधान जातकों की अन्तर्भावना को कोई जल्दी पहिचान नही पाता है। जातक के अन्दर मानव परीक्षक के गुण विद्यमान होते हैं। शनि की सिफ़्त चालाकी, आलसी, धीरे धीरे काम करने वाला, शरीर में ठंडक अधिक होने से रोगी, आलसी होने के कारण बात बात मे तर्क करने वाला, और अपने को दंड से बचाने के लिये मधुर भाषी होता है। दाम्पत्यजीवन सामान्य होता है। अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन और धान्य कम ही होता है। जातक न तो समय से सोते हैं और न ही समय से जागते हैं। हमेशा उनके दिमाग में चिन्ता घुसी रहती है। वे लोहा, स्टील, मशीनरी, ठेका, बीमा, पुराने वस्तुओं का व्यापार, या राज कार्यों के अन्दर अपनी कार्य करके अपनी जीविका चलाते हैं। शनि प्रधान जातक में कुछ कमिया होती हैं, जैसे वे नये कपडे पहिनेंगे तो जूते उनके पुराने होंगे, हर बात में शंका करने लगेंगे, अपनी आदत के अनुसार हठ बहुत करेंगे, अधिकतर जातकों के विचार पुराने होते हैं। उनके सामने जो भी परेशानी होती है सबके सामने उसे उजागर करने में उनको कोई शर्म नही आती है। शनि प्रधान जातक अक्सर अपने भाई और बान्धवों से अपने विचार विपरीत रखते हैं, धन का हमेशा उनके पास अभाव ही रहता है, रोग उनके शरीर में मानो हमेशा ही पनपते रहते हैं, आलसी होने के कारण भाग्य की गाडी आती है और चली जाती है उनको पहिचान ही नही होती है, जो भी धन पिता के द्वारा दिया जाता है वह अधिकतर मामलों में अपव्यय ही कर दिया जाता है। अपने मित्रों से विरोध रहता है। और अपनी माता के सुख से भी जातक अधिकतर वंचित ही रहता है।
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सावन दूर्वा गणेश चतुर्थी पर करें

सावन दूर्वा गणेश चतुर्थी पर करें 11 गांठ दूर्वा का यह उपाय, दूर होंगी बाधाएं; नोट करें पूजा का शुभ मुहूर्त
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सावन का महीना सिर्फ भगवान शिव की आराधना तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस पवित्र माह में उनके पुत्र भगवान श्री गणेश की पूजा का भी बेहद खास महत्व माना गया है। सावन महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी को •’दूर्वा गणेश चतुर्थी’ के नाम से जाना जाता है।

इस दिन गणपति जी को दूर्वा अर्पित कर पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से बप्पा की शरण में आता है, उसके जीवन की सभी विघ्न-बाधाएं चुटकी में दूर हो जाती हैं।

⚜️कब है दूर्वा गणेश चतुर्थी 2026?
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पंचांग की गणना के अनुसार, सावन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 15 अगस्त 2026 को शाम 05:28 बजे से शुरू हो जाएगी। इस तिथि का समापन 16 अगस्त को शाम 04:52 बजे होगा। सनातन धर्म में उदया तिथि की मान्यता होने के कारण दूर्वा गणेश चतुर्थी का व्रत और पूजन 16 अगस्त 2026 को ही किया जाएगा।

⚜️पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त
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16 अगस्त को गणेश जी की पूजा-अर्चना के लिए सबसे शुभ समय सुबह 11:06 बजे से लेकर दोपहर 01:44 बजे तक रहेगा। भक्तों को पूजा के लिए लगभग 2 घंटे 38 मिनट की पूरी अवधि मिलेगी। इस समय में बप्पा को सिंदूर, दूर्वा और मोदक/लड्डू अर्पित करना बेहद फलदायी रहेगा।

⚜️दिन के अन्य प्रमुख मुहूर्त:-
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🚩अभिजीत मुहूर्त:- दोपहर 12:17 से 01:08 बजे तक

🚩विजय मुहूर्त:- दोपहर 02:50 से 03:41 बजे तक

🚩गोधूलि मुहूर्त:- शाम 07:06 से 07:28 बजे तक

🚩सर्वार्थ सिद्धि योग:- सुबह 06:20 से लेकर 17 अगस्त की सुबह 03:50 बजे तक

⚜️क्यों चढ़ाई जाती है बप्पा को दूर्वा?
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पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था, जिसका आतंक चारों तरफ फैला हुआ था। वह ऋषि-मुनियों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था। उसके अत्याचारों से तंग आकर सभी देवता गणेश जी के पास पहुंचे।

गणपति जी ने संसार की रक्षा के लिए राक्षस को उठाकर निगल लिया। लेकिन, राक्षस के तेज की वजह से गणेश जी के पेट में बहुत भयंकर जलन होने लगी। जब कोई औषधि काम नहीं आई, तब कश्यप ऋषि ने गणेश जी को खाने के लिए दूर्वा (दूब घास) की •21 गांठें दीं। दूर्वा ग्रहण करते ही बप्पा के पेट की जलन शांत हो गई। बस तभी से गणेश पूजन में दूर्वा चढ़ाने का नियम बन गया।

⚜️चतुर्थी पर बच्चों से जरूर करवाएं यह उपाय
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अगर आपके बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता या एकाग्रता की कमी है, तो इस दिन बच्चों से गणेश जी को •11 गांठ दूर्वा और सिंदूर अर्पित कराएं। फिर लड्डू का भोग लगाकर उनसे इस मंत्र का •11 बार जप कराएं:-

🚩”त्रयीमयायाखिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय। अनित्याय सत्याय च नित्यबुद्धि नित्यं निरीहाय॥”

माना जाता है कि यह उपाय करने से बच्चों को बप्पा की कृपा से तेज बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

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उत्तम मनचाही संतान प्राप्ति के लिए कुछ खास उपाय✍️

उत्तम मनचाही संतान प्राप्ति के लिए कुछ खास उपाय✍️

  1. यदि किसी दम्पति को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष में अभिमंत्रित संतान गोपाल यंत्र को अपने घर में स्थापित करके लगातार 16 गुरुवार को ब्रत रखकर केले और पीपल के वृक्ष की सेवा करें उनमे दूध चीनी मिश्रित जल चड़ाकर धुप अगरबत्ती जलाये फिर मासिक धर्म से ठीक तेहरवीं रात्रि में अपने पति से रमण करें संतान सुख अति शीघ्र प्राप्त होगा ।
  2. पति पत्नी गुरुवार का ब्रत रखें या इस दिन पीले वस्त्र पहने , पीली वस्तुओं का दान करें यथासंभव पीला भोजन ही करें …..अति शीघ्र योग्य संतान की प्राप्ति होगी ।
  3. संतान सुख के लिए स्त्री गेंहू के आटे की 2 मोटी लोई बनाकर उसमें भीगी चने की दाल और थोड़ी सी हल्दी मिलाकर नियमपूर्वक गाय को खिलाएं …शीघ्र ही उसकी गोद भर जाएगी ।
  4. शुक्ल पक्ष में बरगद के पत्ते को धोकर साफ करके उस पर कुंकुम से स्वस्तिक बनाकर उस पर थोड़े से चावल और एक सुपारी रखकर सूर्यास्त से पहले किसी मंदिर में अर्पित कर दें और प्रभु से संतान का वरदान देने के लिए प्रार्थना करें …निश्चय ही संतान की प्राप्ति होगी ।
  5. किसी भी गुरुवार को पीले धागे में पीली कौड़ी को कमर में बांधने से संतान प्राप्ति का प्रबल योग बनता है।
  6. संतान प्राप्ति के लिए स्त्री पारद शिवलिंग का नियम से दूध से अभिषेक करें …उत्तम संतान की प्राप्ति होगी ।
  7. हर गुरुवार को भिखारियों को गुड का दान देने से भी संतान सुख प्राप्त होता है ।
  8. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ को लाकर उसे दूध में घिसकर पिलाने से स्त्री को अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है यह अत्यंत ही सिद्ध / परीक्षित प्रयोग है ।
  9. रविवार को छोड़कर अन्य सभी दिन निसंतान स्त्री यदि पीपल पर दीपक जलाये और उसकी परिक्रमा करते हुए संतान की प्रार्थना करें उसकी इच्छा अति शीघ्र पूरी होगी ।
  10. श्वेत लक्ष्मणा बूटी की 21 गोली बनाकर उसे नियमपूर्वक गाय के दूध के साथ लेने से संतान सुख की अवश्य ही प्राप्ति होती है ।
  11. उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ लाकर सदैव अपने पास रखने से निसंतान दम्पति को संतान सुख अवश्य प्राप्त होता है ।
  12. नींबू की जड़ को दूध में पीसकर उसमे शुद्ध देशी घी मिला कर सेवन करने से पुत्र प्राप्ति की संभावना बड़ जाती है ।
  13. माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है। कहीं-कहीं इसे ‘बासियौरा’ नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये। इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है ।
  14. उत्तम पुत्र प्राप्ति हेतु स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये. कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है. इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तभी दम्पति को आपस में सम्बन्ध बनाना चाहिए. इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा. कौन सा स्वर चल रहा है इसकी जांच नथुनों पर अंगुली रखकरकर सकते है ।
  15. योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये. इस स्थिति मे स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा. इस स्थिति में अगर गर्भ ठहरता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवान कन्या प्राप्त होगी ।
  16. प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा ।
  17. मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में सम्बन्ध बनाने से पुरूष अनेको रोगों को प्राप्त सकता है ।
  18. कुछ राते ये भी है जिसमे हमें सम्बन्ध बनाने से बचना चाहिए .. जैसे अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमवाश्या ।
  19. गर्भाधान के लिए ऋतुकाल की आठवीं, दसवी और बारहवीं रात्रि सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इन रात्रियों में सम्बन्ध बनाने के बाद स्त्री के गर्भधारण करने से संतान की कामना रखने वाले दम्पतियों को श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति की सम्भावना बहुत बड़ जाती है । ✍️🇮🇳🕉️

दामोदर द्वादशी आज

दामोदर द्वादशी आज


श्रद्धालु आज मनायेंगे दामोदर द्वादशी, वर्ष 2026 में दामोदर द्वादशी (श्रावण शुक्ल द्वादशी) 24 अगस्त 2026, सोमवार को है।

भगवान विष्णु को कई नामों से जाना जाता है, उनका एक नाम दामोदर भी है। इसी नाम पर भगवान विष्णु के लिए द्वादशी व्रत किया जाता है, जिसे दामोदर द्वादशी कहा जाता है। दामोदर द्वादशी को व्रत सावन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को किया जाता है। इस दिन सभी भक्त भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करते हैं।

पूजा और नियम

व्रत व पूजन: इस दिन भगवान श्री विष्णु (दामोदर रूप) की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है।

तुलसी और भोग: भगवान को तुलसी दल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।

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