जीवित्पुत्रिका व्रत व्रत कल 3 अक्टूबर को किया जाएगा एवं श्राद्धपक्ष में पितरों को जल किस चीज़ से देना चाहिए गरुड़ पुराण,स्कंद पुराण और पितृ सूक्त के अनुसार संपूर्ण विधि क्या है
पितरों को जल देना सबसे बड़ा धर्म है, जल ही पितरों का भोजन है, जल ही पितरों का अमृत है। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु कहते हैं – हे गरुड़, पितरों को अन्न नहीं, जल चाहिए, जो पुत्र अपने पितरों को जल नहीं देता, उसके पितर 1 वर्ष तक प्यासे भटकते हैं, और उसके घर में पानी की कमी होती है, घड़े फूटते हैं, नल सूखते हैं।
पितरों को जल कैसे देना, किस पात्र से देना, किस मंत्र से देना, किस दिशा में देना, किस समय देना, इसमें यदि गलती हुई तो जल पितरों तक नहीं, राक्षसों तक जाता है। इसीलिए शास्त्र में जल दान की पूरी विधि बताई है।
- पात्र कौन सा हो?
पितरों को कभी भी स्टील, लोहा, प्लास्टिक, काँच के लोटे से जल नहीं देना चाहिए। गरुड़ पुराण कहता है – लोहा राक्षस धातु है, स्टील में पितर जल ग्रहण नहीं करते।
उत्तम पात्र है 👉🏻 तांबे का लोटा।
तांबा भगवान सूर्य का धातु है, तांबे में रखा जल अमृत बन जाता है। यदि तांबा नहीं है तो पीतल का लोटा, या मिट्टी का करवा, या कांसे का पात्र ले सकते हैं। सबसे उत्तम है – दोनों हाथों को जोड़कर अंजलि से जल देना, इसे ही ब्रह्मांजलि कहते हैं।
- जल कैसा हो?
सादा नल का जल पितरों को नहीं देना चाहिए। जल में ये 7 चीजें मिलानी चाहिए, तभी वह पितृ जल बनता है।
गंगाजल 👉🏻 सबसे जरूरी, एक चम्मच गंगाजल मिलाएं, यदि गंगाजल नहीं है तो किसी भी पवित्र नदी का जल, या तुलसी दल से शुद्ध किया जल।
काला तिल 👉🏻 गरुड़ पुराण कहता है – काला तिल विष्णु के पसीने से बना है, काले तिल के बिना पितर जल ग्रहण नहीं करते, सफेद तिल देवताओं का है, काला तिल पितरों का। एक चुटकी काला तिल अवश्य डालें।
कुशा 👉🏻 कुशा की पवित्री पहनकर, कुशा को जल में डालकर तर्पण करें, कुशा ब्रह्मा के रोम से बनी है, कुशा के बिना श्राद्ध अधूरा है।
जौ 👉🏻 जौ देवताओं का अन्न है, जौ डालने से पितर तृप्त होते हैं।
तुलसी दल 👉🏻 तुलसी विष्णुप्रिया है, तुलसी दल डालने से पितर वैकुंठ जाते हैं।
सफेद चंदन 👉🏻 थोड़ा सा चंदन मिलाएं, सुगंध से पितर प्रसन्न होते हैं।
फूल 👉🏻 सफेद फूल, विशेषकर सफेद कनेर, या गुलाब की पंखुड़ी।
जल में क्या नहीं मिलाना?
सिंदूर, हल्दी, रोली, लाल फूल, तुलसी में काला तिल के साथ सिंदूर नहीं।
- दिशा कौन सी हो?
पितरों को जल हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके देना चाहिए, क्योंकि दक्षिण यम की दिशा है, पितरों का वास दक्षिण में है। देवताओं को पूर्व में, पितरों को दक्षिण में।
बैठने के लिए 👉🏻 कुशा का आसन, या ऊन का आसन, उस पर बैठें, जनेऊ को दाएं कंधे से बाएं (अपसव्य) करें, यानी जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखें, यह पितृसूत्र है। देवताओं में जनेऊ बाएं कंधे पर, पितरों में दाहिने कंधे पर।
- समय कौन सा हो?
पितरों को जल देने का सर्वोत्तम समय है – सुबह 11:30 से दोपहर 12:30 तक, इसे कुतप काल कहते हैं, इस समय दिया गया जल सीधे पितरों तक जाता है। शाम को, रात को, दोपहर 3 बजे के बाद जल न दें, वह राक्षसों को जाता है।
रोज तर्पण कर सकते हैं, पर पितृ पक्ष में, अमावस्या को, पिता की पुण्यतिथि को, श्राद्ध के दिन अवश्य करें।
- मंत्र कौन सा बोलें?
बिना मंत्र के दिया जल पितरों तक नहीं जाता। गरुड़ पुराण के अनुसार ये मंत्र बोलें –
सबसे पहले हाथ में जल, काला तिल, कुशा लेकर बोलें 👇🏻
ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलांजलिम्।
फिर पिता के लिए 👇🏻
पिता का नाम गोत्र 👉🏻 ॐ अमुक गोत्र पिता अमुक नाम तृप्यताम्, इदं तिलोदकं तुभ्यं स्वधा।
जैसे 👉🏻 ॐ भारद्वाज गोत्र पिता रामलाल तृप्यताम्, इदं तिलोदकं तुभ्यं स्वधा। ऐसे 3 बार जल दें।
फिर दादा के लिए, फिर परदादा के लिए।
माता के लिए 👉🏻 मातामही, प्रमातामही के लिए भी जल दें।
अंत में सब पितरों के लिए
ॐ ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्र निष्पीडनोदकम्।
ॐ ये बान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोयमिच्छति।
इसका अर्थ है 👉🏻 हमारे कुल में जो बिना पुत्र के मर गए, जो बंधु-बांधव हैं, जो दूसरे जन्म के बंधु हैं, वे भी मेरे इस जल से तृप्त हों।
- जल कहाँ गिरना चाहिए?
तर्पण का जल जमीन पर नहीं गिरना चाहिए, किसी थाली, परात, या तांबे की बड़ी थाली में गिरना चाहिए, या पीपल की जड़ में, या तुलसी की जड़ में नहीं, पीपल में ही दें, तुलसी में पितृ जल नहीं दिया जाता।
जल देते समय हाथ की अंजलि में से जल तर्जनी और अंगूठे के बीच से गिरना चाहिए, यह पितृ तीर्थ है। देवताओं का जल अंगूठे के मूल से, पितरों का तर्जनी-अंगूठे के बीच से।
- विशेष नियम
👉🏻 तर्पण के बाद हाथ धोएं, आचमन करें।
👉🏻 तर्पण करके किसी से बात न करें, सीधे घर आएं।
👉🏻 तर्पण के दिन मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज न खाएं।
👉🏻 तर्पण के बाद गाय, कौए, कुत्ते को भोजन दें, तभी तर्पण पूरा होता है।
👉🏻 यदि आप यात्रा में हैं, तो भी दक्षिण मुख करके केवल जल से भी तर्पण कर सकते हैं, केवल हाथ से भी कर सकते हैं, भाव ही मुख्य है।
गरुड़ पुराण की अंतिम बात
भगवान विष्णु कहते हैं – हे गरुड़, जो पुत्र रोज केवल एक लोटा जल भी अपने पितरों को काले तिल के साथ देता है, उसके पितर 12 वर्ष तक तृप्त रहते हैं, उसके घर में कभी अकाल नहीं पड़ता, उसके वंश में कभी कोई भूखा नहीं मरता, क्योंकि जल ही जीवन है, और पितरों को दिया जल अमृत बनकर उन्हें मोक्ष देता है।
इसीलिए हे मनुष्य, चाहे तुम करोड़पति हो या गरीब, रोज एक लोटा जल तो अपने पितरों को दे ही दिया करो, यही सच्चा श्राद्ध है।
॥ इति पितृ तर्पण विधि सम्पूर्ण ॥
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