D60devta

No.Amsa Ruler / DeityNatureMeaning / Significance

1GhoraMaleficNegatively acute, scary, violent, and ruthless.2RakshasaMaleficPowerful demons; enemies of gods and humans, spreading fear and disorder.3DevaBeneficDivine beings of light with roles in creation.4KuberBeneficGod of wealth, prosperity, accumulation, and resources.5YakshaBeneficSemi-divine nature spirits.6KinnarBeneficCelestial musicians and entertainers.7BhrashtaMaleficMorally fallen, corrupt, or unlawful.8KulaghnaMaleficDestroys or tarnishes family reputation.9GaralaMaleficPoison, contamination, and toxicity.10Agni / VahiniBeneficSacred fire; purifier and transformer.11MayaMaleficIllusion, deceit, and delusion.12PurishakaMaleficDirtiness, filth, and lack of hygiene.13ApampatiBeneficVaruna; god of water, oceans, and trade.14MarutBeneficWind god providing strength and support.15KaalMaleficTime as destroyer; death and endings.16SarpaMaleficSnake symbolism; danger, cunning, and revenge.17AmritaBeneficDivine nectar of immortality and rejuvenation.18InduBeneficThe Moon; calmness, health, and wellbeing.19MriduBeneficGentle and soft-natured.20KomalaBeneficTender, delicate, and graceful.21HerambaBeneficProtective form of Ganesha.22BrahmaBeneficThe Creator of the universe.23VishnuBeneficThe Preserver and protector.24MaheshwaraBeneficShiva; destroyer of ignorance.25ArdraBeneficFreshness, moisture, and renewal.26KalinashaBeneficDispeller of conflict and disharmony.27KshitishBeneficLord of earth; authority and rulership.28KamalakaraBeneficLotus symbol of beauty and purity.29GulikaMaleficShadowy planet with Saturn-like difficult influence.30MrityuMaleficDeath and transformation.31DaavagniMaleficForest fire; destructive force.32YamaMaleficGod of death and moral order.33KantakaMaleficThorn; obstacles, pain, and difficulties.34SudhaBeneficNectar; purity, healing, and life-supporting energy.35PoornachandraBeneficFull Moon; beauty, compassion, and fulfillment.36VishadagdhaMaleficAffliction through grief or poison.37KulanashaMaleficFamily ruin and reputation damage.38VanshakshyaMaleficDestruction of lineage or heirs.39UtpataMaleficTurbulence, disturbance, and chaos.40SaumyaBeneficGentle, kind, peaceful, and harmonious.41SheetalaBeneficCooling, soothing, and healing.42Karal-danstraMaleficFierce-toothed; terrifying and violent.43ChandramukhiBeneficMoon-faced; beauty and grace.44PraveenaBeneficExpertise, talent, and skill.45KalagniMaleficCosmic fire of destruction.46DandayudaMaleficPunishment, discipline, and severity.47NirmalaBeneficPurity, cleanliness, and clarity.48KrooraMaleficCruel, harsh, and severe nature.49AtisheetalaBeneficExtremely calm, cooling, and peaceful.50PayodhiBeneficOcean of milk; nourishment and abundance.51BhramanaMaleficWandering, instability, and uncertainty.52ChandrarekhaBeneficMoonbeam; hope and inspiration.53DhwajavahanaBeneficVictory, leadership, and success.54VishwadevaBeneficUniversal harmony and righteousness.55PitrBeneficAncestral spirits, tradition, and legacy.56ShakiniMaleficMischievous and harmful female spirit.57DakiniMaleficWild, fierce, and disruptive female entity.58RogaMaleficDisease and affliction.59VyadhiMaleficSickness, chronic conditions, and suffering.60BhayaMaleficFear, anxiety, insecurity, and dread.

Navratri mein Maa ki sawari

रविवार (Sunday) को नवरात्रि का आरंभ होने पर मां दुर्गा का आगमन हाथी (गज) की सवारी पर होता है।

धार्मिक महत्व और फल

शास्त्रों और श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) के वार से माता के आगमन और प्रस्थान का वाहन तय होता है।

  • आगमन – हाथी (गज): रविवार या सोमवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता हाथी पर सवार होकर आती हैं।
  • फल: हाथी पर मां का आगमन बेहद शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा, बेहतर फसल, सुख-समृद्धि, और देश में धन-धान्य की वृद्धि का संकेत देता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब नवरात्रि की शुरुआत रविवार या सोमवार के दिन होती है, तब मां दुर्गा का वाहन हाथी (गज) होता है।

हाथी पर मां दुर्गा के आगमन का महत्व

  • सुख-समृद्धि का प्रतीक: हाथी को ज्ञान, ऐश्वर्य, स्थिरता और वैभव का प्रतीक माना जाता है।
  • धन-धान्य में वृद्धि: मान्यता है कि जब माता रानी हाथी पर सवार होकर आती हैं, तो देश और समाज में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती।
  • उत्तम वर्षा और खुशहाली: इसे अच्छी वर्षा, फसल की पैदावार और चहुंओर खुशहाली का संकेत माना जाता है।

शस्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा/घटस्थापना) के वार से तय होता है कि माता किस वाहन पर सवार होकर आ रही हैं। रविवार और सोमवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन हाथी पर होता है।

अति शीघ्र धन प्राप्ति के उपाय

  • माता लक्ष्मी और विष्णु जी के मंदिर जाएं, उन्हें खीर का भोग लगाएं तथा श्री सूक्त का पाठ करें।
  • इत्र का प्रयोग: शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी को गुलाब का इत्र अर्पित करें और रोज सुबह स्नान के बाद वही इत्र लगाकर काम पर जाएं।
  • अखंड दीप: मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए उनके सामने 11 दिनों तक लगातार घी या तेल का अखंड दीपक जलाएं।

वास्तु के सरल उपाय

  • तिजोरी की दिशा: घर की तिजोरी या अलमारी का मुंह हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे धन में वृद्धि होती है।
  • नलों से पानी टपकना: घर के किसी भी नल से लगातार पानी का टपकना आर्थिक नुकसान का संकेत माना जाता है, इसे तुरंत ठीक करवाएं।
  • साफ-सफाई: मां लक्ष्मी का वास वहीं होता है जहां साफ-सफाई और शांति रहती है। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा स्वच्छ रखें। [1, 2]

अन्य अचूक उपाय

  • शिवलिंग पर जल: प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल अर्पित करें और ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ मंत्र की एक माला (108 बार) जप करें।
  • कुबेर अभिषेक: किसी पात्र में केसर मिला हुआ जल तैयार करें और उससे धन के देवता कुबेर का स्मरण करते हुए अभिषेक करें

विषय चयन के 4 मुख्य भाव और ग्रह

बच्चों की पढ़ाई और नौकरी में सबसे बड़ी गलती माता-पिता करते हैं,अपनी इच्छा थोपना। कुंडली साफ बताती है बच्चे का दिमाग किस तरफ चलेगा।

विषय चयन के 4 मुख्य भाव और ग्रह

कुंडली में 3 भाव देखे जाते हैं
2रा भाव – वाणी / याददाश्त
4था भाव – बेसिक शिक्षा
5वां भाव – बुद्धि, किस विषय में रुचि
10वां भाव – कर्म / नौकरी

1. किस ग्रह से कौन सा विषय / नौकरी?

सूर्य
प्रशासन, राजनीति, IAS, मेडिकल (हड्डी, हार्ट), सरकारी नौकरी
बच्चा बचपन से लीडर होगा, बहस में जीतेगा।

चन्द्रमा मनोविज्ञान, होटल मैनेजमेंट, पानी, दूध, नर्सिंग, टीचिंग, ट्रेवल
मन चंचल, कल्पनाशील बच्चा।

मंगल इंजीनियरिंग, पुलिस, सेना, सर्जरी, जमीन, स्पोर्ट्स, मैकेनिकल
बच्चा जिद्दी, मार-पीट वाला, एनर्जी बहुत।

बुध CA, बैंकिंग, वकालत, पत्रकारिता, कंप्यूटर, गणित, बिजनेस, ज्योतिष
बच्चा हिसाब में तेज, बोलने में तेज, 2-3 काम एक साथ।

बृहस्पति शिक्षा, प्रोफेसर, बैंक PO, धर्म, कानून (जज), HR
बच्चा समझदार, गुरु जैसा, 12 साल से ही ज्ञान की बातें।

शुक्र आर्ट, डिजाइन, फैशन, फिल्म, ब्यूटी, गायन, ज्वेलरी, लक्जरी
बच्चा सुंदरता पसंद, कपड़े-खिलौने में ध्यान।

शनि लोहे, कानून, वकालत, इंजीनियरिंग, मेहनत वाले काम, IT, तेल
बच्चा धीरे सीखेगा पर जो सीखेगा पक्का, बचपन में शर्मीला।

राहु विदेशी भाषा, कोडिंग, AI, इलेक्ट्रॉनिक्स, जासूसी, शेयर मार्केट, अचानक वाले काम
बच्चा ट्रिक में तेज, नया गैजेट जल्दी सीखेगा।

केतु रिसर्च, साइंस, मेडिकल रिसर्च, आध्यात्म, मोक्ष वाले काम

नियम
5वें भाव में जो ग्रह है, या 5वें भाव के स्वामी के साथ जो ग्रह है, वही विषय।

5वां भाव मेष/वृश्चिक = मंगल के विषय, वृषभ/तुला = शुक्र के विषय, ऐसे ही।

2. नौकरी सरकारी या प्राइवेट? किस उम्र में?

सरकारी योग सूर्य + मंगल + बृहस्पति का संबंध 10वें भाव से। 10वें का स्वामी उच्च, सूर्य 10° के आसपास, मंगल 10वें में।

प्राइवेट/बिजनेस बुध + शुक्र + शनि का 10वें से संबंध। 10वें में चर राशि हो तो बिजनेस, स्थिर राशि हो तो नौकरी।

नौकरी लगने की उम्र D-10 से
शनि और 10वें स्वामी की दशा में नौकरी। गुरु की दशा में पढ़ाई पूरी।

3. कौन सी दशा सहयोग करती है?

बच्चे के लिए 3 दशा बहुत जरूरी

a) 12 से 22 साल – पढ़ाई की दशा
यदि इस समय बुध, गुरु, शुक्र की महादशा / अंतर्दशा आए तो पढ़ाई बहुत अच्छी।
शनि, राहु, केतु, मंगल की दशा इस समय आए तो पढ़ाई में ब्रेक, ध्यान भटकेगा।
उपाय – उस ग्रह का रत्न नहीं, उसकी चीज दान और पढ़ाई का माहौल बदलना।

b) 22 से 32 साल, नौकरी की दशा
इस समय 10वें स्वामी, 11वें स्वामी, लग्नेश, सूर्य, शनि की दशा नौकरी लगवाती है।
6ठा भाव नौकरी का है – 6ठे स्वामी की दशा में प्रतियोगिता में जीत।

c) सबसे बड़ा नियम, योगकारक दशा
हर लग्न का एक योगकारक ग्रह होता है –
👉मेष/वृश्चिक – गुरु + सूर्य
👉वृषभ/तुला – शनि + बुध
👉मिथुन/कन्या – शुक्र
👉कर्क/सिंह – मंगल + गुरु
👉मकर/कुंभ – शुक्र + बुध
👉धनु/मीन – मंगल + सूर्य

योगकारक की दशा में बच्चा टॉप करता है, नौकरी लगती है।

उदाहरण
कन्या लग्न का बच्चा। उसका योगकारक शुक्र। यदि 18 साल में शुक्र की महादशा शुरू हो गई तो बच्चा डिजाइन, CA, बैंकिंग में टॉप करेगा। उसी समय शनि की दशा आए तो इंजीनियरिंग, कानून में जाएगा।

4. माता-पिता क्या करें?

1. बच्चे की कुंडली में 5वां भाव खाली है तो 5वें स्वामी को देखो कहाँ है – उसी ग्रह का विषय दो।
2. जबरदस्ती साइंस मत दो – यदि 5वें में शुक्र/चंद्र है तो बच्चा आर्ट्स में टॉपर बनेगा, साइंस में फेल।
3. दशा देखकर विषय बदलो – 10वीं के बाद जो महादशा 5-6 साल चलेगी, उसी से जुड़ा कोर्स कराओ।

*पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए….?

*पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए….?

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।

इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।


भाग 1 – गरुड़ पुराण क्या कहता है – अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं –

“अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।”
अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और उसे खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो।

और दूसरा श्लोक –
“जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी।”

गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं –

1. जाति दोष – अन्न किसने उगाया? किस भाव से उगाया? अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।

2. निमित्त दोष – अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा – रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।

3. आश्रय दोष – अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।

पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।

भाग 2 – पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है? – सूक्ष्म विज्ञान

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं – सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।

वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।

आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है।

अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो –

  • उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा।
  • उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी।
  • उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।

इसलिए गरुड़ पुराण कहता है – पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक “पवित्र घड़ा” है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?

आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।

भाग 3 – 5 कारण – क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर – गरुड़ पुराण के अनुसार

कारण 1 – आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है

इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है – पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।

अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा – “स्वगृहे भोजनं कुर्यात्” – अपने घर का ही भोजन करो।

कारण 2 – दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है

पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।

गरुड़ पुराण कहता है – जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।

श्लोक है – “परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।” पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।

कारण 3 – कर्ज का सिद्धांत – अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज

सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।

पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है – देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज – मनुष्य का कर्ज – ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।

गरुड़ पुराण में कथा है – एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी – “मेरा काम हो जाए”, पितरों ने कहा – “तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।”

कारण 4 – प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है – जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं।

जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।

और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।

इसलिए पुराने लोग कहते थे – पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।

कारण 5 – आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है

गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत – अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है।

जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।

जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।

भाग 4 – किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए – गरुड़ पुराण की सूची

गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है –

  1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर – जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
  2. शराबी, मांसाहारी के घर – जहाँ जीव हत्या होती हो।
  3. पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में – जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
  4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर – जहाँ काम वासना का वास हो।
  5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर – उसका पैसा अपवित्र है।
  6. श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर – जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
  7. होटल, ढाबा, बाजार का भोजन – जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
  8. दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न – अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।

भाग 5 – क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए – पितृपक्ष का आहार विधान

तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है –

खाने योग्य –

  • अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
  • बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का – क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।
  • जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल।
  • एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
  • भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।

न खाने योग्य –

  • 16 दिन – मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।
  • बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।

जल का नियम –
पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।

कहा गया है – “जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।” दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।

भाग 6 – अपवाद – कब दूसरे के घर खा सकते हैं?

गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है –

1. गुरु के घर – अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।

2. पुत्री के घर – पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।

3. आपातकाल में – अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, “पितृभ्यो नमः” कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।

पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं – घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।

भाग 7 – आज के जीवन में कैसे पालन करें – प्रैक्टिकल उपाय

आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय –

1. टिफिन ले जाओ – 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।

2. फलाहार करो – अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।

3. मानसिक क्षमा मांगो – अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो – “हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।”

4. गायत्री मंत्र से शुद्धि – भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।

5. तुलसी दल डालो – कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।

अंतिम – पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व है

पितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।

गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में –

“पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।”
जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।

और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं – “धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।”

इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो – बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।

क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।

।। इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा ।।

जीवन को सुखी बनाने के 25 अचूक उपाय

जीवन को सुखी बनाने के 25 अचूक उपाय
===============================
जीवन को सुखी बनाने संबंधी छोटे-छोटे उपाय जानिये ये 25 महत्वपूर्ण उपाय हम आपके लिए लाये हैं। जिन्हे आजमा कर आप भी अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं।

  1. यदि कोई काम नहीं हो रहा है। बहुत बाधाएं आ रही हैं तो जिस दिन सोमवार की अष्टमी हो उस दिन 31 मूंग के दाने, 31 चावल के दाने और 31 बेलपत्र लेकर शिव मंदिर जाएं। अपनी मनोकामना बोलकर चावल को शिवजी के मंदिर की दहलीज पर रख दो। ऐसा रखो कि किसी का पैर नहीं लगे। मूंग के दाने को नंदी भगवान के उस पैर के पास रखो जो उनका पैर ऊंचा रहता है। 31 बेलपत्र जलाधारी में जहां से जल निकलता है उससे अशोक सुंदरी का स्थान कहते हैं। वहां पर उन बेलपत्रों को रख दो। अगली सोमवार की अष्टमी तक आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी।
  2. मंगलवार और बुधवार को लिया गया कर्ज कभी चुकता नहीं होता है। ऐसे में इन 2 दिनों में कर्ज न लेने की सलाह दी जाती है। ऋण से मुक्ति पाने के लिए मंगलवार को भगवान शिव को मसूर की दाल चढ़ाते हुए •ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः: मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे कर्ज से मुक्ति मिल जाती है।
  3. कई बार ऐसा होता है कि एक दुख से छुटकारा मिला कि दूसरा खड़ा हो जाता है। एक समस्या से मुक्ति मिली नहीं कि दूसरी सामने आ जाती है। ऐसे में प्रदोष के दिन प्रदोष काल में 2 जगहों पर दीपक लगाना प्रारंभ कर दें। पहला दीया बेलपत्र के वृक्ष के नीचे और दूसरे दीया अपने दरवाजे की चौखट के बाहर उस ओर जब हम घर में प्रवेश करें तो राइट हैंड पर लगाएं। दोनों ही जगह शिवजी से प्रार्थना करें कि हे नंदीश्वर आप जब भी प्रदोष काल में भ्रमण पर निकले तो मैंने भी आपके लिए द्वार सजाया है। थोड़ी दया मेरे घर की चौखट पर भी कर देना।
  4. किसी भी सोमवार, सोमवार की अष्टमी और शिवरात्रि पर गंभीर बीमारी से मुक्ति पाने के लिए शमी के फूल को नीलकंठेश्वर महादेव का नाम लेकर शिवलिंग पर अर्पित कर दें। इसके अलावा गाय का घी अर्पित कर दें। पांच कमलगट्टे और पांच बेलपत्र तांबे के लोटे में जल भरकर रख लें। सीधे हाथ में उस लोटे को रखो और •श्री शिवाय नमस्तुभ्यं। इस मंत्र का पांच बार स्मरण करके लोटे को माथे से लगाकर अपनी तकलीफ को मन में रखकर इस लौटे को अपने गांव, नगर आदि से दूर एकांत में जहां पर शिव मंदिर हो या किसी वृक्ष के नीचे शिवलिंग हो वहां पर उस शिवलिंग पर यह जल कमलगट्टे और बेलपत्र सहित अर्पित कर दें। उसमें से एक कमलगट्टे और बेलपत्र को उठाकर अपने घर पर लेकर आ जाओ और उसे पूजा घर में रखकर शिवजी का स्मरण करो।
    📲9887799966
  5. शुक्रवार के दिन एक तांबे के लोटे में जल भरें। एक आंकड़े का फूल लें। दोनों को लेकर शिव मंदिर में जाएं और शिवलिंग पर सबसे पहले तांबे के लोटे का जल अर्पित करें। जल अर्पित करते समय श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र का जप करें। इसके बाद आंकड़े के फूल को जलाधारी में अशोक सुंदरी वाले स्थान पर अर्पित कर देना हैं।
  6. शुक्रवार को शमी के पत्ते को पहले शिवलिंग के पास अर्पित करें और फिर उसी पत्ते को उठाकर शिवलिंग के ऊपर •श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र बोलते हुए अर्पित कर दें। महाशिवरात्रि के दिन जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर से दरिद्रता दूर भाग जाती है। शमी वृक्ष के पत्तों तथा चमेली के फूल से शिव जी का पूजन करने पर अपार धन-संपदा का आशीष मिलता है। महाशिवरात्रि पर सायंकाल के समय शिव मंदिर में दीया जलाने से धन संबंधी समस्याएं दूर होकर अपार धन-संपत्ति तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं।
  7. श्रावण मास की दशमी तिथि को शमी के 11, 21 या 51 पत्ते लेकर शहद में डुबोकर शंकर भगवान के शिवलिंग का श्रृंगार करो। लिंगपुराण कहता है कि जब हम शमी के पत्ते को शहद में डुबोकर शिवलिंग का श्रृंगार करते हैं तो शंकर भगवान हमें कर्ज से मुक्ति दिलाते हैं।
  8. मंगलवार के दिन शिवलिंग को पके चावल से ढक दो और फिर उसके बाद उस पर 7 बेलपत्र अर्पित कर दो। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय बहुत ही अचूक है और ऐसा करने से आपकी धन से जुड़ी सभी समस्याएं दूर होती है और आप कर्ज से मुक्ति हो जाएंगे। मां लक्ष्मी की कृपा आप सब पर बनी रहेगी।
  9. मंगलवार के दिन भगवान शिव को मसूर की दाल का भोग लगाना है और जब आप मसूर की दाल चढ़ाएं तो इस मंत्र का उच्चारण जरूर करें- •ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः। ऐसे करने से जल्द ही कर्ज से मुक्ति मिलेगी।
  10. एक चुटकी हल्दी और 2 हरी इलाइजी। दोनों इलाइची पर हल्दी का लेप लगा लें और अब दो आटे के दीपक लें और उसमें घी डालकर बाती लगा लें। अब पहला दीपक गणेशजी की प्रतिमा या चित्र के सामने •ॐ गं गणपतये नमः: का जाप करते हुए प्रज्वलित करें। उसमें एक हरी इलायची भी अर्पित कर दें। इस दौरान गणेशजी से कर्ज मुक्ति की कामना करें। अब तुलसी के गमले में थोड़ा सा गड्ढा करके दूसरी इलायची को दबा देना है और दूसरा दीपक उसी इलायची के ऊपर रखकर तुलसी माता के समक्ष •ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: या •ॐ महालक्ष्मी नमः: का 108 बार जाप करते हुए प्रज्वलित कर देना है। इस दौरान माता से धन समृद्धि की कामना भी करना है।
  11. •’एक लोटा जल सभी समस्या का हल’ यानी एक लोटा जल भगवान शिव को चढ़ाने से मनुष्य की सारी समस्याओं का निराकरण हो जाता है। शिवजी को जल अर्पित करते वक्त बिल्वपत्र पर शहद लगाकर चढ़ाना, आंकड़े का फूल चढ़ाना और चंदन अर्पित करना बहुत ही शुभ होता है।
  12. जो बिल्वपत्र भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है उसे फेंकना नहीं चाहिए अपितु उसे खा लेना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य रोग मुक्त हो जाता है।
  13. प्रति सोमवार के दिन भगवान शिव की आराधना करने से गृह कलह से पूरी तरह छुटकारा मिलता हैं।
  14. शिव पुराण के उपाय के अनुसार सोमवार के दिन भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद भी उस व्यक्ति पर हमेशा बना रहता है।
  15. सोमवार के दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाने से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी प्रकार की समस्याएं हल कर देते हैं।
  16. यदि नेत्रों से संबंधित कोई भी परेशानी है तो महाशिवरात्रि के दिन रात को 12 बजे शहद के साथ बिल्वपत्र चढ़ाने और उस शहद को एक बर्तन में इकट्ठा करने के बाद अवधूतेश्वर महादेव का नाम लेकर उस शहद को 3 महीने तक नेत्रों में काजल की तरह लगाने पर आंखों की रोशनी में फायदा होता है।
  17. परिवार का कोई सदस्य गंभीर रोग से पीड़ित हैं तो शमी के पेड़ से एक फूल लेकर नीलकंठेश्वर महादेव का जाप करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए। इसके बाद नीलकंठेश्वर महादेव से थोड़ा जल लेकर उस रोगी के शरीर पर लगाना चाहिए। इस उपाय से रोगी को लाभ मिलता है।
  18. किसी की समय पर शादी नहीं हो पा रही है या विवाह में अड़चन आ रही हैं तो एक सूखा नारियल का गोला लेकर ऊपर की और से थोढ़ा सा ढक्कन की तरह काट लें। फिर इस नारियल में सत्यनारायण भगवान का प्रसाद या पंजीरी भरकर उसे कटे हुए भाग से बंद कर दें। इस नारियल को किसी पीपल के पेड़ के नीचे दबा दें। शिव जी की कृपा से उस व्यक्ति का विवाह बहुत जल्द ही हो जाएगा।
  19. परिवार को किसी सदस्या को अकाल मृत्यु से बचाना हैं तो आप नर्मदा नदी से निकले शिवलिंग को अपने घर के मंदिर में स्थापित कर उसकी नित्य पूजा करें। इससे आपके घर में कभी अकाल मृत्यु नहीं होगी।
  20. यदि किसी महिला को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो उस महिला के रजस्वला यानी मासिक धर्म के सातवें दिन सफेद आंकड़े की जड़ को लेकर शिवलिंग पर 7 बार घुमाकर शिव जी का आह्वान करते हुए संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। फिर उस आंकड़े की जड़ को किसी लाल कपड़े में बांधकर महिला की कमर पर बांध दें। इस उपाय से शिवजी चाहेंगे तो जल्द ही गोद भर जाएगी।
  21. यदि बहुत सारा कर्ज है तो वट्केश्वर महादेव का नाम लें और थोड़े दिन तक वट वृक्ष के नीचे एक लोटा जल अर्पित करते रहें। धीरे धीरे कर्ज से जुड़ी सारी परेशानियां आपकी दूर हो जाएंगी।
  22. नजर दोष निवारण के लिए शिवरात्रि के दिन 12 कांटे वाला धतूरा लेकर इसको शिवलिंग पर सात बार फेरते हुए •’ओम नमः: शिवाय’ मंत्र का जाप करें। इसके बाद धतूरे को दुसरे दिन जिस जगह नजर लगी हैं। उस जगह पर लाल कपडे में बांधकर लटका दें। इससे नजर दोष दूर हो जाएगा।
  23. यदि आर्थिक तंगी से परेशान हैं तो बेलपत्र पर लाल चंदन लगाकर शिवलिंग पर चढ़ा दें। इससे माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं और उनके आशीर्वाद कभी भी आर्थिक तंगी नहीं होगी।
  24. गंभीर रोग से मुक्ति के लिए शिवरात्रि के दिन या सावन मास के सोमवार पर गोबरी को जलाकर राख कर दें। अब गोबरी की राख और गंगाजल को मिश्रित करके एक लेप जैसा तैयार करें। अब इसे रोगी के शरीर पर लगाएं। इससे रोग में फायदा होगा।
  25. यदि आपके सामने कोई बहुत बड़ी समस्या कर खड़ी हो जाए और उसका कोई हल नजर न आए तो शिव मंदिर के पास बेलपत्र का पेड़ ढूंढिए उस बेलपत्र के पेड़ के नीचे एक मूंग का दाना या एक चावल और साथ ही वहां पर जो भी एक कंकड़ रखा हो उसे भगवान शिव का स्वरूप मानकर लोटा भर जल अर्पित करें। जल अर्पित करने के बाद आप अपनी समस्या शिवजी के समक्ष रख दें। आपकी समस्या का जल्द ही निवारण होगा।

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।

इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।


भाग 1 – गरुड़ पुराण क्या कहता है – अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं –

“अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।”
अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और उसे खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो।

और दूसरा श्लोक –
“जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी।”

गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं –

1. जाति दोष – अन्न किसने उगाया? किस भाव से उगाया? अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।

2. निमित्त दोष – अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा – रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।

3. आश्रय दोष – अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।

पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।

भाग 2 – पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है? – सूक्ष्म विज्ञान

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं – सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।

वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।

आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है।

अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो –

  • उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा।
  • उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी।
  • उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।

इसलिए गरुड़ पुराण कहता है – पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक “पवित्र घड़ा” है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?

आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।

भाग 3 – 5 कारण – क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर – गरुड़ पुराण के अनुसार

कारण 1 – आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है

इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है – पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।

अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा – “स्वगृहे भोजनं कुर्यात्” – अपने घर का ही भोजन करो।

कारण 2 – दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है

पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।

गरुड़ पुराण कहता है – जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।

श्लोक है – “परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।” पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।

कारण 3 – कर्ज का सिद्धांत – अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज

सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।

पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है – देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज – मनुष्य का कर्ज – ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।

गरुड़ पुराण में कथा है – एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी – “मेरा काम हो जाए”, पितरों ने कहा – “तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।”

कारण 4 – प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है – जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं।

जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।

और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।

इसलिए पुराने लोग कहते थे – पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।

कारण 5 – आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है

गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत – अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है।

जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।

जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।

भाग 4 – किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए – गरुड़ पुराण की सूची

गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है –

  1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर – जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
  2. शराबी, मांसाहारी के घर – जहाँ जीव हत्या होती हो।
  3. पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में – जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
  4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर – जहाँ काम वासना का वास हो।
  5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर – उसका पैसा अपवित्र है।
  6. श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर – जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
  7. होटल, ढाबा, बाजार का भोजन – जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
  8. दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न – अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।

भाग 5 – क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए – पितृपक्ष का आहार विधान

तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है –

खाने योग्य –

  • अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
  • बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का – क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।
  • जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल।
  • एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
  • भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।

न खाने योग्य –

  • 16 दिन – मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।
  • बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।

जल का नियम –
पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।

कहा गया है – “जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।” दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।

भाग 6 – अपवाद – कब दूसरे के घर खा सकते हैं?

गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है –

1. गुरु के घर – अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।

2. पुत्री के घर – पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।

3. आपातकाल में – अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, “पितृभ्यो नमः” कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।

पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं – घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।

भाग 7 – आज के जीवन में कैसे पालन करें – प्रैक्टिकल उपाय

आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय –

1. टिफिन ले जाओ – 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।

2. फलाहार करो – अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।

3. मानसिक क्षमा मांगो – अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो – “हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।”

4. गायत्री मंत्र से शुद्धि – भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।

5. तुलसी दल डालो – कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।

अंतिम – पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व है

पितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।

गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में –

“पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।”
जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।

और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं – “धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।”

इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो – बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।

क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।

।। इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा ।।

अनंत चतुर्दशी स्थायी लक्ष्मी प्रयोग

💸💰💸💰💸💰💸💰💸

अनंत चतुर्दशी स्थायी लक्ष्मी प्रयोग

💸💰💸💰💸💰💸💰💸

दिव्य शक्तियों की मदद के माध्यम से ही जीवन में आर्थिक पूर्णता प्राप्त हो सकती है। आर्थिक पूर्णता का तात्पर्य यह है कि हमारे पास धन की प्रचुरता हो और वह धन हमारे लिए आनंद का कारण बने… तनाव का कारण नहीं बने। और आनंद के साथ लक्ष्मी प्राप्ति के लिए दैवी कृपा अत्यंत आवश्यक है।

सिद्धाश्रम पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी,शुक्रवार, दिनांक 25 सितंबर 2026 को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त से रात्रि में लगभग 11:00 बजे के बीच अनंत चतुर्दशी है, जो लक्ष्मी और नारायण दोनों की साधना के लिए अत्यंत ही अनुकूल सिद्ध महादिवस है। इसी सिद्ध पर्व को दृष्टिगोचर रखते हुए आज ग्रुप में एक ऐसा लक्ष्मी प्राप्ति प्रयोग प्रेषित किया जा रहा है, जिसे बहुत कम समय में संपन्न होने के बाद भी अत्यंत प्रभावशाली है। यह छोटा सा प्रयोग आपके जीवन में आर्थिक दृष्टि से महान परिवर्तन कर सकता है।

🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷🪷

वास्तु टिप्स (ज्ञान)

👉वास्तु टिप्स (ज्ञान) –
*जब *रसोई दक्षिण-पूर्व में नहीं है* और बाथरूम दक्षिण-पूर्व यानी अग्नि कोण में है, तो घर में “अग्नि तत्व” कमजोर हो जाता है।*
========================
इससे होता क्या है – पैसा नहीं टिकता, आलस, पाचन की समस्या, घर में गर्माहट/प्यार की कमी।

इसलिए रसोई में रोज “अग्नि को मजबूत” करने की पूजा करनी पड़ेगी 🙏

अग्नि तत्व बैलेंस करने के लिए रसोई की 5 खास पूजा

1. रोज की 2 मिनट वाली पूजा – सबसे जरूरी

  1. गैस जलाने से पहले: गैस ऑन करने से पहले दाहिने हाथ से 3 बार ताली बजाएं और बोलें “ॐ अग्नि देवाय नमः”।
  2. पहली रोटी: पहली रोटी गाय के लिए निकालें। दूसरी रोटी पर थोड़ा घी-गुड़ लगाकर कुत्ते/कौए के लिए। इससे अग्नि देव प्रसन्न होते हैं।

2. साप्ताहिक पूजा

  1. कपूर + लौंग: हर मंगलवार और रविवार को रसोई में 2 लौंग के साथ कपूर जलाएं। पूरे घर में धुआं घुमाएं। ये अग्नि दोष काटता है और बाथरूम वाली नेगेटिविटी साफ करता है।
  2. अग्नि यंत्र: रसोई के दक्षिण-पूर्व कोने में दीवार पर “अग्नि यंत्र” या लाल रंग का स्वस्तिक बनाएं। रोज उस पर चावल का 1 दाना चढ़ाएं।

3. महीने में 1 बार

  1. हवन/धूप: महीने में 1 बार रसोई में गुग्गल, लोबान या देशी घी की धूप करें। मंत्र बोलें – ॐ ह्रीं अग्नये नमः 11 बार।

रसोई में ये 4 चीजें जरूर रखें

  1. लाल रंग का कपड़ा: गैस के नीचे या स्लैब पर लाल रंग का छोटा कपड़ा बिछाएं। अग्नि तत्व बढ़ेगा।
  2. तांबे का लोटा: रसोई के दक्षिण-पूर्व कोने में तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें। रोज बदलें।
  3. नमक: शीशे की डिब्बी में सेंधा नमक रखें। कांच में रखा नमक अग्नि और जल दोनों को बैलेंस करता है।
  4. तस्वीर: रसोई में अन्नपूर्णा देवी या कृष्ण जी की छोटी फोटो लगाएं।

3 चीजें बिल्कुल न करें

  1. टूटी गैस/बर्नर – खराब बर्नर पर खाना न बनाएं। अग्नि दोष बढ़ता है।
  2. जूठे बर्तन रात भर – रात को रसोई में जूठे बर्तन न छोड़ें। अग्नि अपवित्र होती है।
  3. काला रंग – रसोई में काला, गहरा नीला रंग न करें।

सार

जब अग्नि कोण में बाथरूम हो तो रसोई को ही “मंदिर” बना दीजिए।
रोज की छोटी पूजा + सफाई + लाल रंग = अग्नि तत्व बैलेंस।
📲9910057645
‼️ जय श्री कृष्णा ‼️

मान प्रतिष्ठा कम होने लगे तो ये करे :-

मान प्रतिष्ठा कम होने लगे तो ये करे :-
=^=^=^=^=^=^=^=^=^=^=

👉 घर में दीमक बहुत बढ़ने लगे समझ लीजिये अब या तब
गड़बड़ हुई ।
👉👉अचानक लोगो से दूर रहने का मन करने लगे तो भी समझ लीजिये अब परेशानी आने वाली है ।
👉👉ससुराल से सम्बन्ध बिगड़ने लगे तो समझिये की अब एक के बाद एक आपको दिक्कते आनी शुरू हो जाएँगी ।
चाहे genuine तरीके से बिगड़े या किसी की भी गलती से बिगड़े । जो भी कर रहे है समझिये उसमे परेशानी
आनी शुरू होने वाली है ।
astroshaliini.wordpress.com
👉👉अगर बुजुर्गो से झगडा होने लगे तो दिक्कत बहुत तेजी से आयेगी ।
👉👉कई बार बुजुर्ग भी गलत बात कह जाते है । है तो सब इन्सान लेकिन अगर बुजुर्गो की गलत बात से आपका
झगडा तू तू मैं मैं में बदलने लगे तो उसे आप नोटिस मत करियेगा । झगड़ीयेगा बिलकुल नहीं ।नहीं तो दिक्कत आप पे आयेगी ।

👉👉यदि ये सारे लक्षण आपको अपने आस पास दिखे तो समझ लीजिये की प्रतिष्ठा बढ़नी रुकने वाली है
या प्रतिष्ठा घटने वाली है साख कम होने पे आपके market पे बहुत बुरा असर पड़ने वाला है ।
या फिर आपकी नौकरी में दिक्कत होगी ।
astroshaliini.wordpress.com
👉👉जरूरी नहीं की इनमे से सारे उपाय आप करे इनमे से 3-4 भी उपाय आप कर ले तो ईश्वर कृपा से
आपकी उन्नति नहीं रुकेगी ।
👉👉ये काम वो लोग जरूर करे जिनकी प्रतिष्ठा दाँव पे लगी रहती है ।
सामाजिक राजनितिक पब्लिक डीलिंग वाले लोग किताब लिखने वाले लोग जरूर कर ले
astroshaliini.wordpress.com
उपाय 1) आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ करे 3 बार सूर्य के सामने
2) ॐ घृणी सूर्याय नमः का कम से कम 108 बार जप कर ले
3) गायत्री का जप कर ले ,(यदि उपाय 2 नहीं कर सकते तो ये करे ये भी सुबह करना होगा )
4) प्रत्येक रविवार गायत्री यज्ञ करे
5) घर की पूर्व दिशा से रौशनी आये इसका उपाय करे यदि हवा भी आयेगी तो अच्छा रहेगा ।
6) घर में तुलसी का पौधा जरूर लगा दे
7) प्रत्येक रविवार गुड और चावल की खीर लोगो को खिलाये और खुद भी खाए

8) उपाय के तौर पे पिता की सेवा जरूर करनी होगी
9) और दस गायो को अनाज दिया करे हफ्ते में एक दिन कर सकते है।

astroshaliini.wordpress.com

Design a site like this with WordPress.com
Get started