ग्रह + खराब / नीच राशि = क्या नुकसान होता है

ग्रह + खराब / नीच राशि = क्या नुकसान होता है

लोग बोलते हैं – “ग्रह तो अच्छा है, पर राशि खराब है” – मतलब क्या? सीधा समझो।

ग्रह = आदमी, राशि = घर/कुर्सी।
अच्छा आदमी भी अगर गलत घर में बैठा हो, गंदी कुर्सी पर बैठा हो तो काम नहीं करेगा। सूर्य राजा है, पर तुला राशि में गया – तुला में सूर्य की कुर्सी टूटी – राजा भिखारी जैसा।

नीच राशि क्या
हर ग्रह की एक नीच राशि – जहाँ वो सबसे कमजोर:

  • सूर्य नीच – तुला
  • चंद्र नीच – वृश्चिक
  • मंगल नीच – कर्क
  • बुध नीच – मीन
  • गुरु नीच – मकर
  • शुक्र नीच – कन्या
  • शनि नीच – मेष
  • राहु नीच – कर्क/वृश्चिक (मतांतर) – पर नीच जैसा खराब फल देता है
  • केतु नीच – वृषभ/तुला

जब ग्रह नीच राशि में तो क्या? – बाहर से ग्रह है, अंदर से पावर जीरो – “सपोर्ट सिस्टम फेल” – वही जो नवांश में बताया था।

*9 ग्रह + नीच / खराब राशि = पूरा नुकसान – विस्तार से *
1. सूर्य + तुला / नीच राशि – अहंकार चोट खाए, पिता से मनमुटाव, सरकारी काम अटके

  • सूर्य राजा, पिता, सरकारी नौकरी, रिस्पेक्ट, हड्डी, आत्मविश्वास का कारक
  • तुला में सूर्य – राजा तराजू की दुकान में – “तौल-मोल” करना पड़े – राजा को पसंद नहीं – अहंकार चोट खाता है
  • नुकसान:
    • पिता से मनमुटाव – पिता बीमार, पिता से लड़ाई, पिता का सपोर्ट नहीं – पिता बोले “तू नालायक है”
    • सरकारी काम अटकते हैं – फाइल अटके, सरकारी नौकरी में प्रमोशन रुके, सरकारी अफसर इज्जत नहीं दे
    • लोग रिस्पेक्ट नहीं देते – मीटिंग में बोलो तो कोई सुने नहीं – “तू कौन है?”
    • आत्मविश्वास टूटे – अंदर से डर – “मैं कर पाऊंगा क्या?” – हड्डी/आंख में समस्या, सिर दर्द
    • अहंकार को ठेस – कोई बेइज्जती कर दे तो दिल पर लगे – महीनों न भूले
  • कब ज्यादा खराब? – 1, 7, 10 भाव में तुला सूर्य ज्यादा खराब – लग्न में तो पूरी जिंदगी स्ट्रगल
  • छुपा हुआ प्लस: तुला में सूर्य नीचभंग हो तो – शनि साथ/दृष्टि – आदमी बिजनेस में राजा – बैलेंस से पैसा कमाए – राजा नहीं, बणिया बन कर जीते तो सुखी
  • उपाय: पिता की सेवा – सबसे बड़ा उपाय – रोज सुबह सूर्य को जल, “ॐ घृणि सूर्याय नमः” 108 बार, पिता के पैर छुओ, सरकारी काम में रिश्वत नहीं, अहंकार छोड़ो।

2. चंद्रमा + वृश्चिक / नीच राशि – ओवरथिंकिंग, मूड स्विंग, माँ की सेहत खराब, नींद उड़ी

  • चंद्रमा मन, माँ, मन की शांति, पानी, नींद, इमोशन का कारक
  • वृश्चिक में चंद्रमा – मन गहरे कुएं में – वृश्चिक जहर, बदला, गहरा – मन हमेशा डरे – “कुछ बुरा होगा क्या”
  • नुकसान:
    • ओवरथिंकिंग – एक बात को 100 बार सोचना – रात को 2 बजे तक जागना – “उसने ऐसा क्यों बोला”
    • मूड स्विंग – सुबह खुश, शाम को रोना – कोई समझे नहीं – खुद भी न समझे – इमोशनल टूटना
    • माँ की सेहत खराब – माँ बीमार, माँ से दूरी, माँ से लड़ाई – माँ का प्यार नहीं मिला
    • नींद उड़ जाती है – नींद नहीं, डरावने सपने, पानी से डर, डिप्रेशन टेंडेंसी – मन का डॉक्टर चाहिए
    • पानी/खून में कमी, सर्दी-जुकाम बार-बार, इमोशनल ब्लैकमेल करना/सहना
  • कब ज्यादा खराब? – 4, 7, 8 भाव में वृश्चिक चंद्रमा सबसे खराब – 8 में तो डिप्रेशन पक्का
  • छुपा हुआ प्लस: वृश्चिक चंद्रमा नीचभंग हो तो – मंगल साथ/दृष्टि – आदमी जासूस, डॉक्टर, सर्जन, रिसर्चर – गहरे मन से पैसा – मन का डॉक्टर बने तो करोड़पति
  • उपाय: शिव जी – चंद्रमा का उपाय शिव ही – रोज शिवलिंग पर जल, “ॐ सोमाय नमः” 108 बार, माँ की सेवा, दूध दान, ध्यान, रात को मोबाइल बंद – मन शांत।

3. मंगल + कर्क / नीच राशि – गुस्सा अंदर दबता है, एनर्जी जीरो, भाई-बहन से झगड़ा, प्रॉपर्टी विवाद

  • मंगल एनर्जी, गुस्सा, भाई, खून, जमीन, प्रॉपर्टी, हिम्मत का कारक
  • कर्क में मंगल – आग पानी में – आग बुझी, पानी गरम – न आग जले, न पानी ठंडा – एनर्जी अंदर ही अंदर सड़े
  • नुकसान:
    • गुस्सा अंदर दबता है – बाहर हंसना, अंदर जलना – “बोल नहीं पाया, अब अंदर घुट रहा हूं” – फिर एक दिन फटना – बम जैसा
    • एनर्जी जीरो – सुबह उठने का मन नहीं, जिम जाओ थक जाओ, काम टालना – एनर्जी गलत जगह – गुस्से में बर्तन तोड़ना पर काम में जीरो
    • भाई-बहन से झगड़ा – भाई पैसा न दे, प्रॉपर्टी में लड़ाई, भाई से बात बंद – खून के रिश्ते में खून-खराबा
    • प्रॉपर्टी विवाद – जमीन का केस, मकान नहीं बनता, मकान में दरार, प्रॉपर्टी बिकती नहीं, खरीदते ही झगड़ा
    • खून की कमी, ऑपरेशन, चोट छाती/पेट पर, एसिडिटी
  • कब ज्यादा खराब? – 4, 7, 10 में कर्क मंगल – घर/शादी/करियर में आग-पानी का झगड़ा
  • छुपा हुआ प्लस: कर्क मंगल नीचभंग – चंद्रमा साथ – आदमी प्रॉपर्टी डीलर, बिल्डर, होटल वाला – पानी से पैसा – पर गुस्सा कंट्रोल करना सीखे तो
  • उपाय: हनुमान जी – सबसे बड़ा उपाय – “ॐ अं अंगारकाय नमः” 108 बार, हनुमान चालीसा रोज, गुस्सा लिख कर निकालो, भाई से प्यार, जमीन का दान नहीं लेना।

*4. बुध + मीन / नीच राशि – बात नहीं बना पाते, बिजनेस में धोखा, कन्फ्यूजन, स्टडी में मन नहीं *

  • बुध वाणी, बुद्धि, बिजनेस, हिसाब, बोली, स्किन, नर्वस सिस्टम का कारक
  • मीन में बुध – बुद्धि पानी में – पानी में हिसाब नहीं चलता – बह जाता है – बात बहक जाए
  • नुकसान:
    • बात नहीं बना पाते – मीटिंग में बोलो तो लोग समझे नहीं – “क्या बोल रहा है?” – इंटरव्यू में फेल
    • बिजनेस में धोखा – पार्टनर हिसाब में गड़बड़, पेपर में गलती, ईमेल गलत जगह जाना – 99% डील पर कैंसिल
    • कन्फ्यूजन – एक ही बात पर 10 बार सोचना – “करूं या न करूं” – डिसीजन नहीं ले पाना
    • स्टडी में मन नहीं – पढ़ो तो भूल जाओ, एग्जाम में ब्लैंक, डिग्री है पर नॉलेज नहीं – याददाश्त कम
    • स्किन एलर्जी, नर्वस, हकलाना, झूठ बोलना/सुनना
  • कब ज्यादा खराब? – 2, 5, 10 में मीन बुध – पैसा/पढ़ाई/करियर में कन्फ्यूजन
  • छुपा हुआ प्लस: मीन बुध नीचभंग – गुरु साथ – आदमी कवि, लेखक, कहानीकार, ज्योतिषी – कल्पना से पैसा – पर हिसाब का काम किसी और से करवाए
  • उपाय: गणेश जी – बुद्धि के देवता – “ॐ बुं बुधाय नमः” 108 बार, गणेश जी को दूर्वा, लिख कर बोलना सीखो, एक डायरी रखो, झूठ बंद।

5. गुरु + मकर / नीच राशि – भाग्य साथ नहीं देता, गुरु/बॉस सपोर्ट नहीं करते, गलत सलाह से नुकसान

  • गुरु भाग्य, ज्ञान, बच्चा, शादी, पैसा, गुरु, धर्म का कारक
  • मकर में गुरु – ज्ञान पहाड़ पर – पहाड़ ठंडा, सख्त – ज्ञान जम जाए – भाग्य सो जाए
  • नुकसान:
    • भाग्य साथ नहीं देता – मेहनत 100%, किस्मत 10% – “मैं ही क्यों पीछे?” – लॉटरी में भी हार
    • गुरु/बॉस सपोर्ट नहीं करते – टीचर, गुरु, बॉस, पिता – कोई गाइड न करे – अकेले भटको
    • गलत सलाह से नुकसान – खुद की सलाह गलत, दूसरों की सलाह मानो तो और नुकसान – “गुरु जी ने बोला था, डूब गया”
    • बच्चा होने में देरी, बच्चे से दूरी, बच्चे की चिंता, शादी में देरी – गुरु शादी भी है
    • पैसा आए पर ज्ञान नहीं, ज्ञान आए पर पैसा नहीं – बैलेंस नहीं
  • कब ज्यादा खराब? – 9, 5, 7 में मकर गुरु – भाग्य/बच्चा/शादी में देरी पक्की
  • छुपा हुआ प्लस: मकर गुरु नीचभंग – शनि साथ – आदमी मेहनत से ज्ञानी, कर्म से भाग्य बनाए – 40 के बाद राजयोग – देर से पर टिकाऊ – नेता, जज, बड़ी कंपनी का बॉस
  • उपाय: विष्णु जी, केले के पेड़ को जल, “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” 108 बार, गुरु की सेवा, गरीब बच्चों को पढ़ाओ, केले दान, अहंकार नहीं, सीखना जारी रखो।

*6. शुक्र + कन्या / नीच राशि – रिश्तों में कोल्डनेस, पैसा आए पर सुख न मिले, स्किन/हॉर्मोन इश्यू *

  • शुक्र प्यार, शादी, सुंदरता, पैसा, सेक्स, सुख, गाड़ी, कपड़ा का कारक
  • कन्या में शुक्र – प्यार हिसाब-किताब में – कन्या हिसाब वाली, शुक्र मजे वाला – हिसाब में मजा नहीं
  • नुकसान:
    • रिश्तों में कोल्डनेस – प्यार है पर दिखता नहीं – पति-पत्नी में “तूने I Love You क्यों नहीं बोला?” – ठंडापन – रोमांस जीरो
    • पैसा आए पर सुख न मिले – पैसा है पर मजा नहीं – महंगी गाड़ी पर टेंशन, महंगा घर पर लड़ाई – “सब है पर सुकून नहीं”
    • स्किन/हॉर्मोन इश्यू – चेहरे पर दाग, हार्मोन गड़बड़, शुगर, किडनी, प्राइवेट पार्ट में समस्या, सुंदरता में कमी
    • पार्टनर नखरे वाला, हिसाबी, हर बात पर टोके – “इतना खर्च क्यों?”
    • शादी में देरी/असंतोष, प्रेम में धोखा – परफेक्ट पार्टनर की तलाश में टाइम वेस्ट
  • कब ज्यादा खराब? – 7, 12, 2 में कन्या शुक्र – शादी/बिस्तर/पैसे में ठंडापन
  • छुपा हुआ प्लस: कन्या शुक्र नीचभंग – बुध साथ – आदमी फैशन डिजाइनर, अकाउंटेंट, डॉक्टर, ब्यूटी बिजनेस – हिसाब से सुंदरता बनाए – पैसा कमाए पर प्यार में हिसाब नहीं
  • उपाय: लक्ष्मी जी, “ॐ शुं शुक्राय नमः” 108 बार, वफादार रहो, दिखावा बंद, सफेद चीज दान – दही, चावल, इत्र कम, सादगी, पार्टनर की तारीफ करो।

*7. शनि + मेष / नीच राशि – मेहनत का फल नहीं मिलता, हर काम में डिले, लोग यूज करके छोड़ देते हैं *

  • शनि मेहनत, नौकरी, कर्म, दुख, लोहा, गरीब, देरी का कारक
  • मेष में शनि – बूढ़ा जवान के घर में – मेष जवान, तेज, शनि बूढ़ा, धीमा – दोनों की नहीं बने – काम अटके
  • नुकसान:
    • मेहनत का फल नहीं मिलता – सबसे ज्यादा काम तुम, सबसे कम पैसा तुम – “मैं ही क्यों घिसूं?”
    • हर काम में डिले – शादी लेट, नौकरी लेट, प्रमोशन लेट, घर लेट – सब लेट – 30 का काम 40 में
    • लोग यूज करके छोड़ देते हैं – दोस्त काम निकाले फिर भूल जाए, बॉस यूज करे, पार्टनर यूज करे – “मतलबी दुनिया”
    • सिर/हड्डी में दर्द, घुटने में दर्द, थकान, आलस नहीं, पर थकान – “एनर्जी खत्म”
    • जिम्मेदारी का बोझ – कर्ज, परिवार का बोझ – “मैं ही क्यों सब संभालूं?”
  • कब ज्यादा खराब? – 10, 7, 1 में मेष शनि – करियर/शादी/खुद में देरी और बोझ
  • छुपा हुआ प्लस: मेष शनि नीचभंग – मंगल साथ – आदमी आर्मी, पुलिस, इंजीनियर, मेहनत से लीडर – 36 के बाद शनि राजा – देर से पर बड़ा
  • उपाय: हनुमान जी + शनि – पीपल को जल, “ॐ शं शनैश्चराय नमः” 108 बार, मेहनत से मत भागो, गरीब को कंबल/जूता दान, हनुमान चालीसा – शनि लेट देगा पर बेस्ट देगा।

*8. राहु + कर्क / वृश्चिक – ऑब्सेशन, स्कैंडल का डर, अचानक लॉस, नशे की लत का रिस्क *

  • राहु धुआं, विदेश, शॉर्टकट, धोखा, अचानक पैसा/लॉस, नशा, स्कैंडल का कारक
  • कर्क/वृश्चिक में राहु – धुआं पानी/जहर में – पानी गंदा, जहर और बढ़े – मन में जहर
  • नुकसान:
    • ऑब्सेशन – एक ही चीज का जुनून – पैसा/प्यार/नशा – “बस वही चाहिए” – पागलपन तक
    • स्कैंडल का डर – बदनामी का डर, चोरी-छुपे काम, अफेयर, काला पैसा – पकड़े जाने का डर
    • अचानक लॉस – रातों-रात पैसा डूबे – शेयर, जुआ, क्रिप्टो, लोन – “कल तक करोड़पति, आज भिखारी”
    • नशे की लत लगने का रिस्क – शराब, सिगरेट, दवा – मन कमजोर तो नशा पकड़े
    • घर/माँ से दूरी, मन में डर, भूत-प्रेत का डर, पानी से डर, ससुराल में धोखा
  • कब ज्यादा खराब? – 4, 7, 8, 12 में कर्क/वृश्चिक राहु – घर/शादी/संकट/खर्च में स्कैंडल
  • छुपा हुआ प्लस: राहु कर्क/वृश्चिक में नीच जैसा पर विदेश/रिसर्च में राजा – डॉक्टर, जासूस, समुद्र पार पैसा – पर शॉर्टकट नहीं, रिसर्च से
  • उपाय: भैरव + शिव – “ॐ रां राहवे नमः” 108 बार, शिव को जल, नारियल दान, शॉर्टकट बंद, एक काम पकड़ो, नशा बंद, शिव चालीसा।

9. केतु + वृषभ / तुला – रिश्ते अचानक टूटते हैं, पैसा आए पर टिके नहीं, वैराग्य बढ़े

  • केतु अलगाव, मोक्ष, अचानक कट, वैराग्य, आध्यात्म, कुत्ता, झंडा का कारक
  • वृषभ/तुला में केतु – वैराग्य पैसे/प्यार में – वृषभ/तुला पैसा/प्यार की राशि, केतु बोले “छोड़ दे” – पैसा/प्यार टिके नहीं
  • नुकसान:
    • रिश्ते अचानक टूटते हैं – बिना लड़ाई ब्रेकअप, बिना बताए नौकरी छोड़ी, बिना वजह दूरी – “कल तक ठीक था, आज खत्म”
    • पैसा आए पर टिके नहीं – पैसा आए, खर्च हो जाए, हाथ में न टिके – लॉटरी जैसा – आया-गया
    • वैराग्य बढ़ जाता है – “पैसा-प्यार बेकार, अकेला ठीक” – भीड़ में अकेला – किसी से दिल न लगे
    • गले/आंख/स्किन में समस्या, पैसे का हिसाब गड़बड़, लग्जरी से नफरत/लत दोनों
  • कब ज्यादा खराब? – 2, 7, 11 में वृषभ/तुला केतु – पैसा/शादी/दोस्त में अचानक कट
  • छुपा हुआ प्लस: वृषभ/तुला केतु नीच जैसा पर आध्यात्म/फैशन/ब्यूटी में पैसा – पर पैसा बचाना सीखो, रिश्ते में टिकना सीखो
  • उपाय: गणेश जी + लक्ष्मी – “ॐ कें केतवे नमः” 108 बार, कुत्ते को रोटी, गणेश जी को लड्डू, पैसे का हिसाब लिखो, रिश्ते में दिल से जुड़ो, वैराग्य नहीं, प्यार।

*महा उपाय – नीच राशि का ग्रह कैसे ठीक करें- 3 स्टेप *
1. नीचभंग राजयोग देखो: नीच ग्रह के साथ उसका उच्च स्वामी हो या दृष्टि हो तो नीचभंग – तो डरना नहीं, देर से राजा बनेगा – जैसे तुला सूर्य के साथ शनि हो तो नीचभंग – बिजनेस में पैसा
2. रिश्ता सुधारो: जिस ग्रह की राशि नीच, उस रिश्ते को सुधारो – सूर्य पिता, चंद्र माँ, मंगल भाई, बुध बहन/दोस्त, गुरु गुरु/बच्चा, शुक्र पत्नी, शनि नौकर/गरीब, राहु/केतु शिव।
3. मंत्र + दान + सेवा – अंदर ठीक करो:

  • रत्न नीच ग्रह का कभी मत पहनो – और खराब करेगा – मंत्र और सेवा ही उपाय।

एक लाइन में सार:

“ग्रह नीच राशि में तो आदमी राजा के कपड़े में भिखारी – दिखेगा राजा, जिएगा भिखारी जैसा – जब तक अंदर की कुर्सी ठीक नहीं, बाहर की कुर्सी काम नहीं करेगी।”
*अपनी कुंडली भेजो – कौन सा ग्रह नीच राशि में है, मैं बताऊंगा नीचभंग है या नहीं और असली उपाय
*कम शब्दों में – ग्रह + नीच राशि = नुकसान*
क्या होता है? ग्रह राजा, राशि टूटी कुर्सी = पावर जीरो।

  • सूर्य तुला: पिता से झगड़ा, सरकारी काम अटके, इज्जत नहीं
  • चंद्र वृश्चिक: ओवरथिंकिंग, नींद उड़ी, माँ बीमार, डिप्रेशन
  • मंगल कर्क: गुस्सा अंदर, एनर्जी जीरो, भाई/प्रॉपर्टी झगड़ा
  • बुध मीन: बात नहीं बने, डील कैंसिल, कन्फ्यूजन
  • गुरु मकर: भाग्य सोए, बॉस सपोर्ट नहीं, गलत सलाह
  • शुक्र कन्या: प्यार में ठंडापन, पैसा है सुख नहीं, स्किन इश्यू
  • शनि मेष: मेहनत का फल नहीं, हर काम लेट, लोग यूज करें
  • राहु कर्क/वृश्चिक: जुनून, स्कैंडल, अचानक लॉस, नशा रिस्क
  • केतु वृषभ/तुला: रिश्ता/पैसा अचानक जाए, टिके नहीं, अकेलापन
    उपाय: रत्न मत पहनो – देवता सेवा + रिश्ता सुधार + मंत्र 108 बार।
    कम शब्दों में
    क्या ग्रह=आदमी, राशि=कुर्सी – कुर्सी टूटी तो आदमी काम नहीं करेगा।
  • सूर्य तुला: पिता से झगड़ा, सरकारी काम अटके, इज्जत नहीं।
  • चंद्र वृश्चिक: ओवरथिंकिंग, नींद गायब, डिप्रेशन।
  • मंगल कर्क: गुस्सा अंदर, एनर्जी जीरो, प्रॉपर्टी झगड़ा।
  • बुध मीन: बात नहीं बने, डील कैंसिल, कन्फ्यूजन।
  • गुरु मकर: भाग्य साथ नहीं, गलत सलाह से नुकसान।
  • शुक्र कन्या: प्यार में ठंडापन, पैसा है सुख नहीं।
  • शनि मेष: मेहनत का फल नहीं, हर काम लेट।
  • राहु कर्क/वृश्चिक: जुनून, स्कैंडल, अचानक लॉस।
  • केतु वृषभ/तुला: रिश्ता/पैसा अचानक टूटे, टिके नहीं।
    उपाय: नीच का रत्न मत पहनो – देवता सेवा + मंत्र 108 बार।

जीवित्पुत्रिका व्रत

जीवित्पुत्रिका व्रत व्रत कल 3 अक्टूबर को किया जाएगा एवं श्राद्धपक्ष में पितरों को जल किस चीज़ से देना चाहिए गरुड़ पुराण,स्कंद पुराण और पितृ सूक्त के अनुसार संपूर्ण विधि क्या है

पितरों को जल देना सबसे बड़ा धर्म है, जल ही पितरों का भोजन है, जल ही पितरों का अमृत है। गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु कहते हैं – हे गरुड़, पितरों को अन्न नहीं, जल चाहिए, जो पुत्र अपने पितरों को जल नहीं देता, उसके पितर 1 वर्ष तक प्यासे भटकते हैं, और उसके घर में पानी की कमी होती है, घड़े फूटते हैं, नल सूखते हैं।

पितरों को जल कैसे देना, किस पात्र से देना, किस मंत्र से देना, किस दिशा में देना, किस समय देना, इसमें यदि गलती हुई तो जल पितरों तक नहीं, राक्षसों तक जाता है। इसीलिए शास्त्र में जल दान की पूरी विधि बताई है।

  1. पात्र कौन सा हो?
    पितरों को कभी भी स्टील, लोहा, प्लास्टिक, काँच के लोटे से जल नहीं देना चाहिए। गरुड़ पुराण कहता है – लोहा राक्षस धातु है, स्टील में पितर जल ग्रहण नहीं करते।

उत्तम पात्र है 👉🏻 तांबे का लोटा।

तांबा भगवान सूर्य का धातु है, तांबे में रखा जल अमृत बन जाता है। यदि तांबा नहीं है तो पीतल का लोटा, या मिट्टी का करवा, या कांसे का पात्र ले सकते हैं। सबसे उत्तम है – दोनों हाथों को जोड़कर अंजलि से जल देना, इसे ही ब्रह्मांजलि कहते हैं।

  1. जल कैसा हो?

सादा नल का जल पितरों को नहीं देना चाहिए। जल में ये 7 चीजें मिलानी चाहिए, तभी वह पितृ जल बनता है।

गंगाजल 👉🏻 सबसे जरूरी, एक चम्मच गंगाजल मिलाएं, यदि गंगाजल नहीं है तो किसी भी पवित्र नदी का जल, या तुलसी दल से शुद्ध किया जल।

काला तिल 👉🏻 गरुड़ पुराण कहता है – काला तिल विष्णु के पसीने से बना है, काले तिल के बिना पितर जल ग्रहण नहीं करते, सफेद तिल देवताओं का है, काला तिल पितरों का। एक चुटकी काला तिल अवश्य डालें।

कुशा 👉🏻 कुशा की पवित्री पहनकर, कुशा को जल में डालकर तर्पण करें, कुशा ब्रह्मा के रोम से बनी है, कुशा के बिना श्राद्ध अधूरा है।

जौ 👉🏻 जौ देवताओं का अन्न है, जौ डालने से पितर तृप्त होते हैं।

तुलसी दल 👉🏻 तुलसी विष्णुप्रिया है, तुलसी दल डालने से पितर वैकुंठ जाते हैं।

सफेद चंदन 👉🏻 थोड़ा सा चंदन मिलाएं, सुगंध से पितर प्रसन्न होते हैं।

फूल 👉🏻 सफेद फूल, विशेषकर सफेद कनेर, या गुलाब की पंखुड़ी।

जल में क्या नहीं मिलाना?
सिंदूर, हल्दी, रोली, लाल फूल, तुलसी में काला तिल के साथ सिंदूर नहीं।

  1. दिशा कौन सी हो?
    पितरों को जल हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके देना चाहिए, क्योंकि दक्षिण यम की दिशा है, पितरों का वास दक्षिण में है। देवताओं को पूर्व में, पितरों को दक्षिण में।

बैठने के लिए 👉🏻 कुशा का आसन, या ऊन का आसन, उस पर बैठें, जनेऊ को दाएं कंधे से बाएं (अपसव्य) करें, यानी जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखें, यह पितृसूत्र है। देवताओं में जनेऊ बाएं कंधे पर, पितरों में दाहिने कंधे पर।

  1. समय कौन सा हो?
    पितरों को जल देने का सर्वोत्तम समय है – सुबह 11:30 से दोपहर 12:30 तक, इसे कुतप काल कहते हैं, इस समय दिया गया जल सीधे पितरों तक जाता है। शाम को, रात को, दोपहर 3 बजे के बाद जल न दें, वह राक्षसों को जाता है।

रोज तर्पण कर सकते हैं, पर पितृ पक्ष में, अमावस्या को, पिता की पुण्यतिथि को, श्राद्ध के दिन अवश्य करें।

  1. मंत्र कौन सा बोलें?
    बिना मंत्र के दिया जल पितरों तक नहीं जाता। गरुड़ पुराण के अनुसार ये मंत्र बोलें –

सबसे पहले हाथ में जल, काला तिल, कुशा लेकर बोलें 👇🏻

ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलांजलिम्।

फिर पिता के लिए 👇🏻

पिता का नाम गोत्र 👉🏻 ॐ अमुक गोत्र पिता अमुक नाम तृप्यताम्, इदं तिलोदकं तुभ्यं स्वधा।

जैसे 👉🏻 ॐ भारद्वाज गोत्र पिता रामलाल तृप्यताम्, इदं तिलोदकं तुभ्यं स्वधा। ऐसे 3 बार जल दें।

फिर दादा के लिए, फिर परदादा के लिए।

माता के लिए 👉🏻 मातामही, प्रमातामही के लिए भी जल दें।

अंत में सब पितरों के लिए
ॐ ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्र निष्पीडनोदकम्।
ॐ ये बान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते तृप्तिमखिलां यान्तु यश्चास्मत्तोयमिच्छति।

इसका अर्थ है 👉🏻 हमारे कुल में जो बिना पुत्र के मर गए, जो बंधु-बांधव हैं, जो दूसरे जन्म के बंधु हैं, वे भी मेरे इस जल से तृप्त हों।

  1. जल कहाँ गिरना चाहिए?
    तर्पण का जल जमीन पर नहीं गिरना चाहिए, किसी थाली, परात, या तांबे की बड़ी थाली में गिरना चाहिए, या पीपल की जड़ में, या तुलसी की जड़ में नहीं, पीपल में ही दें, तुलसी में पितृ जल नहीं दिया जाता।

जल देते समय हाथ की अंजलि में से जल तर्जनी और अंगूठे के बीच से गिरना चाहिए, यह पितृ तीर्थ है। देवताओं का जल अंगूठे के मूल से, पितरों का तर्जनी-अंगूठे के बीच से।

  1. विशेष नियम

👉🏻 तर्पण के बाद हाथ धोएं, आचमन करें।

👉🏻 तर्पण करके किसी से बात न करें, सीधे घर आएं।

👉🏻 तर्पण के दिन मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज न खाएं।

👉🏻 तर्पण के बाद गाय, कौए, कुत्ते को भोजन दें, तभी तर्पण पूरा होता है।

👉🏻 यदि आप यात्रा में हैं, तो भी दक्षिण मुख करके केवल जल से भी तर्पण कर सकते हैं, केवल हाथ से भी कर सकते हैं, भाव ही मुख्य है।

गरुड़ पुराण की अंतिम बात
भगवान विष्णु कहते हैं – हे गरुड़, जो पुत्र रोज केवल एक लोटा जल भी अपने पितरों को काले तिल के साथ देता है, उसके पितर 12 वर्ष तक तृप्त रहते हैं, उसके घर में कभी अकाल नहीं पड़ता, उसके वंश में कभी कोई भूखा नहीं मरता, क्योंकि जल ही जीवन है, और पितरों को दिया जल अमृत बनकर उन्हें मोक्ष देता है।

इसीलिए हे मनुष्य, चाहे तुम करोड़पति हो या गरीब, रोज एक लोटा जल तो अपने पितरों को दे ही दिया करो, यही सच्चा श्राद्ध है।

॥ इति पितृ तर्पण विधि सम्पूर्ण ॥

पार्वती पंचक स्तोत्र

पार्वती पंचक स्तोत्र (Parvati Panchak Stotra) माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली और पांच श्लोकों वाला दिव्य स्तोत्र है।

परिचय एवं उद्देश्य

  • यह स्तोत्र मुख्य रूप से माँ पार्वती की महिमा, उनके दिव्य स्वरूप और शक्ति की स्तुति करता है।
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्तोत्र के रचनाकार आदि शंकराचार्य माने जाते हैं।
  • इसका नियमित पाठ करने से मन शांत और शुद्ध होता है।

मुख्य लाभ एवं महत्व

  • शीघ्र विवाह: मनचाहा जीवनसाथी पाने और विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए इसका पाठ शीघ्र विवाह के उपाय बहुत लाभकारी माना जाता है।
  • दांपत्य सुख: वैवाहिक जीवन में मधुरता, प्रेम और शांति बनी रहती है।
  • मानसिक शांति: यह भक्तों के मन की व्यथा और नकारात्मकता को दूर करता है।

☀ पार्वती पंचक स्त्रोत्र ☀
घराधरेन्द्र नन्दिनी शशांक मौलि संगिनी,
सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी।
निशा चरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी,
मनोव्यथा विदारिणी शिवम् तनोतु पार्वती।।

भुजंग तल्प शामिनी महोग्रकांति भागिनी,
प्रकाश पुंज दायिनी विचित्र चित्र कारिणी।
प्रचण्ड शत्रु धर्षिणी दया प्रवाह वर्षिणी,
सदा सुभाग्य दायिनी शिवम् तनोतु पार्वती।।

प्रकृष्ट सृष्टि कारिका प्रचण्ड नृत्य नर्तिका ,
पनाक पाणिधारिका गिरीश ऋग मालिका।
समस्त भक्त पालिका पीयूष पूर्ण वर्षिका,
कुभाग्य रेख मर्जिका शिवम् तनोतु पार्वती ।।

तपश्चरी कुमारिका जगत्परा प्रहेलिका,
विशुद्ध भाव साधिका सुधा सरित्प्रवाहिका।
प्रयत्न पक्ष पौषिका सदार्धि भाव तोषिका,
शनि ग्रहादि तर्जिका शिवम् तनोतु पार्वती ।।

शुभंकरी शिवंकरी विभाकरी निशाचरी,
नभश्चरी धराचरी समस्त सृष्टि संचरी ।
तमोहरी मनोहरी मृगांक मालि सुन्दरी,
सदोगताप संचरी,शिवं तनोतु पार्वती।।

शुभंकरी शिवंकरी विभाकरी निशाचरी,
नभश्चरी धराचरी समस्त सृष्टि संचरी ।
तमोहरी मनोहरी मृगांक मालि सुन्दरी,
सदोगताप संचरी, शिवं तनोतु पार्वती ।।

पार्वती सम्मुखे नित्यमधीयते या कुमारिका ।
दुष्कृतं निखिलं हत्वा वरं प्राप्नोतिसुन्दरम् ||
हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।

पार्वती पंचक स्तोत्र का महत्व

मान्यता है कि माँ पार्वती स्त्रोत का पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ पार्वती पंचक स्तोत्र का नियमित पाठ करने से, पढ़ने से, सुनने से, चिंतन और मनन से दाम्पत्य जीवन में आनंद और सुख की प्राप्ति होती है, जिन किसी के दाम्पत्य जीवन में कलह क्लेश रहती है उन पति पत्नी के जोड़े के लड़ाई झगड़े सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं और शादी शुदा जीवन में मधुरता आती है, और जिनकी शादी होने में दिक्कत आती है, उनके विवाह में कोई न कोई अड़चन आती रहती है, प्रेम विवाह में कोई समस्या आती है तो उनकी समस्याओं का समाधान शीघ्रता से हो जाता है, तो भक्तों बड़े ही श्रद्धा पूर्वक पार्वती पंचक स्त्रोत का पाठ करना चाहिए
पार्वती पंचक स्तोत्र सभी का हित और कल्याण करने की परंपरा का हिस्सा है, जिसमें पार्वती देवी की महिमा और गुणों का वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र उन सभी भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है जो पार्वती माता की कृपा को प्राप्त करना चाहते हैं। इसका श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ सच्चे मन से पाठ करने से समस्त बुराईयों से बचा जा सकता है और सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति हो सकती है।
इस स्तोत्र में मां पार्वती का चारित्रिक वर्णन किया गया है। वह वेदनेत्रविन्द (आंखों के बीजाक्षर) हैं, जिनकी आंखें नीले रंग की हैं। उनके मस्तक पर छोटा सा चिन्ह है जो चंद्रमा के बीजाक्षर के रूप में प्रतिष्ठित है। उनकी सवारी सूर्य की पहली किरणों का जिसे अरनिमा कहा जाता है और उन्हें नमस्कार किया जाता है जो सर्वग्रह का संचालन करती हैं।
पार्वती पंचक स्तोत्र का उद्देश्य
पार्वती पंचक स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य है पार्वती माता की महिमा और शक्ति को श्रद्धा और भक्ति के साथ स्तुति करना है। इसके माध्यम से भक्त अपने मन में पार्वती देवी के द्वारा मातृत्व के भाव को चेतन कर सकते हैं और उनकी कृपा को प्राप्त कर सकते हैं। यह स्तोत्र वर्णित किए गए श्लोकों के माध्यम से अपने मन को शुद्ध और स्थिर करने का भी उद्देश्य रखता है।
पार्वती पंचक स्तोत्र की महिमा
पार्वती पंचक स्तोत्र की महिमा अत्यंत महान है। यह स्तोत्र पार्वती माँ की प्रशंसा करता है और विभिन्न रूपों में उनकी महानता और सामर्थ्य को दर्शाता है। पार्वती पंचक के पढ़ने मात्र से श्रद्धा और भक्ति में वृद्धि होती है और मातारानी की कृपा के द्वारा आपके सभी विघ्न और दुःख दूर होते हैं। इसके अलावा, इस स्तोत्र को पढ़ने से आपकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और आप प्रगाढ़ और स्थिर भाव में रहते हैं।

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🌺 🙏🏻 जय माता दी 🙏 🌺
🌺 जय मां आदिशक्ति 🌺
🌺 मां के चरणों में जन्नत है 🌺
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D60devta

No.Amsa Ruler / DeityNatureMeaning / Significance

1GhoraMaleficNegatively acute, scary, violent, and ruthless.2RakshasaMaleficPowerful demons; enemies of gods and humans, spreading fear and disorder.3DevaBeneficDivine beings of light with roles in creation.4KuberBeneficGod of wealth, prosperity, accumulation, and resources.5YakshaBeneficSemi-divine nature spirits.6KinnarBeneficCelestial musicians and entertainers.7BhrashtaMaleficMorally fallen, corrupt, or unlawful.8KulaghnaMaleficDestroys or tarnishes family reputation.9GaralaMaleficPoison, contamination, and toxicity.10Agni / VahiniBeneficSacred fire; purifier and transformer.11MayaMaleficIllusion, deceit, and delusion.12PurishakaMaleficDirtiness, filth, and lack of hygiene.13ApampatiBeneficVaruna; god of water, oceans, and trade.14MarutBeneficWind god providing strength and support.15KaalMaleficTime as destroyer; death and endings.16SarpaMaleficSnake symbolism; danger, cunning, and revenge.17AmritaBeneficDivine nectar of immortality and rejuvenation.18InduBeneficThe Moon; calmness, health, and wellbeing.19MriduBeneficGentle and soft-natured.20KomalaBeneficTender, delicate, and graceful.21HerambaBeneficProtective form of Ganesha.22BrahmaBeneficThe Creator of the universe.23VishnuBeneficThe Preserver and protector.24MaheshwaraBeneficShiva; destroyer of ignorance.25ArdraBeneficFreshness, moisture, and renewal.26KalinashaBeneficDispeller of conflict and disharmony.27KshitishBeneficLord of earth; authority and rulership.28KamalakaraBeneficLotus symbol of beauty and purity.29GulikaMaleficShadowy planet with Saturn-like difficult influence.30MrityuMaleficDeath and transformation.31DaavagniMaleficForest fire; destructive force.32YamaMaleficGod of death and moral order.33KantakaMaleficThorn; obstacles, pain, and difficulties.34SudhaBeneficNectar; purity, healing, and life-supporting energy.35PoornachandraBeneficFull Moon; beauty, compassion, and fulfillment.36VishadagdhaMaleficAffliction through grief or poison.37KulanashaMaleficFamily ruin and reputation damage.38VanshakshyaMaleficDestruction of lineage or heirs.39UtpataMaleficTurbulence, disturbance, and chaos.40SaumyaBeneficGentle, kind, peaceful, and harmonious.41SheetalaBeneficCooling, soothing, and healing.42Karal-danstraMaleficFierce-toothed; terrifying and violent.43ChandramukhiBeneficMoon-faced; beauty and grace.44PraveenaBeneficExpertise, talent, and skill.45KalagniMaleficCosmic fire of destruction.46DandayudaMaleficPunishment, discipline, and severity.47NirmalaBeneficPurity, cleanliness, and clarity.48KrooraMaleficCruel, harsh, and severe nature.49AtisheetalaBeneficExtremely calm, cooling, and peaceful.50PayodhiBeneficOcean of milk; nourishment and abundance.51BhramanaMaleficWandering, instability, and uncertainty.52ChandrarekhaBeneficMoonbeam; hope and inspiration.53DhwajavahanaBeneficVictory, leadership, and success.54VishwadevaBeneficUniversal harmony and righteousness.55PitrBeneficAncestral spirits, tradition, and legacy.56ShakiniMaleficMischievous and harmful female spirit.57DakiniMaleficWild, fierce, and disruptive female entity.58RogaMaleficDisease and affliction.59VyadhiMaleficSickness, chronic conditions, and suffering.60BhayaMaleficFear, anxiety, insecurity, and dread.

Navratri mein Maa ki sawari

रविवार (Sunday) को नवरात्रि का आरंभ होने पर मां दुर्गा का आगमन हाथी (गज) की सवारी पर होता है।

धार्मिक महत्व और फल

शास्त्रों और श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) के वार से माता के आगमन और प्रस्थान का वाहन तय होता है।

  • आगमन – हाथी (गज): रविवार या सोमवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता हाथी पर सवार होकर आती हैं।
  • फल: हाथी पर मां का आगमन बेहद शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा, बेहतर फसल, सुख-समृद्धि, और देश में धन-धान्य की वृद्धि का संकेत देता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब नवरात्रि की शुरुआत रविवार या सोमवार के दिन होती है, तब मां दुर्गा का वाहन हाथी (गज) होता है।

हाथी पर मां दुर्गा के आगमन का महत्व

  • सुख-समृद्धि का प्रतीक: हाथी को ज्ञान, ऐश्वर्य, स्थिरता और वैभव का प्रतीक माना जाता है।
  • धन-धान्य में वृद्धि: मान्यता है कि जब माता रानी हाथी पर सवार होकर आती हैं, तो देश और समाज में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती।
  • उत्तम वर्षा और खुशहाली: इसे अच्छी वर्षा, फसल की पैदावार और चहुंओर खुशहाली का संकेत माना जाता है।

शस्त्रों के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा/घटस्थापना) के वार से तय होता है कि माता किस वाहन पर सवार होकर आ रही हैं। रविवार और सोमवार को नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन हाथी पर होता है।

अति शीघ्र धन प्राप्ति के उपाय

  • माता लक्ष्मी और विष्णु जी के मंदिर जाएं, उन्हें खीर का भोग लगाएं तथा श्री सूक्त का पाठ करें।
  • इत्र का प्रयोग: शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी को गुलाब का इत्र अर्पित करें और रोज सुबह स्नान के बाद वही इत्र लगाकर काम पर जाएं।
  • अखंड दीप: मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए उनके सामने 11 दिनों तक लगातार घी या तेल का अखंड दीपक जलाएं।

वास्तु के सरल उपाय

  • तिजोरी की दिशा: घर की तिजोरी या अलमारी का मुंह हमेशा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इससे धन में वृद्धि होती है।
  • नलों से पानी टपकना: घर के किसी भी नल से लगातार पानी का टपकना आर्थिक नुकसान का संकेत माना जाता है, इसे तुरंत ठीक करवाएं।
  • साफ-सफाई: मां लक्ष्मी का वास वहीं होता है जहां साफ-सफाई और शांति रहती है। घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को हमेशा स्वच्छ रखें। [1, 2]

अन्य अचूक उपाय

  • शिवलिंग पर जल: प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव के मंदिर जाकर शिवलिंग पर दूध मिश्रित जल अर्पित करें और ‘ऊँ सोमेश्वराय नम:’ मंत्र की एक माला (108 बार) जप करें।
  • कुबेर अभिषेक: किसी पात्र में केसर मिला हुआ जल तैयार करें और उससे धन के देवता कुबेर का स्मरण करते हुए अभिषेक करें

विषय चयन के 4 मुख्य भाव और ग्रह

बच्चों की पढ़ाई और नौकरी में सबसे बड़ी गलती माता-पिता करते हैं,अपनी इच्छा थोपना। कुंडली साफ बताती है बच्चे का दिमाग किस तरफ चलेगा।

विषय चयन के 4 मुख्य भाव और ग्रह

कुंडली में 3 भाव देखे जाते हैं
2रा भाव – वाणी / याददाश्त
4था भाव – बेसिक शिक्षा
5वां भाव – बुद्धि, किस विषय में रुचि
10वां भाव – कर्म / नौकरी

1. किस ग्रह से कौन सा विषय / नौकरी?

सूर्य
प्रशासन, राजनीति, IAS, मेडिकल (हड्डी, हार्ट), सरकारी नौकरी
बच्चा बचपन से लीडर होगा, बहस में जीतेगा।

चन्द्रमा मनोविज्ञान, होटल मैनेजमेंट, पानी, दूध, नर्सिंग, टीचिंग, ट्रेवल
मन चंचल, कल्पनाशील बच्चा।

मंगल इंजीनियरिंग, पुलिस, सेना, सर्जरी, जमीन, स्पोर्ट्स, मैकेनिकल
बच्चा जिद्दी, मार-पीट वाला, एनर्जी बहुत।

बुध CA, बैंकिंग, वकालत, पत्रकारिता, कंप्यूटर, गणित, बिजनेस, ज्योतिष
बच्चा हिसाब में तेज, बोलने में तेज, 2-3 काम एक साथ।

बृहस्पति शिक्षा, प्रोफेसर, बैंक PO, धर्म, कानून (जज), HR
बच्चा समझदार, गुरु जैसा, 12 साल से ही ज्ञान की बातें।

शुक्र आर्ट, डिजाइन, फैशन, फिल्म, ब्यूटी, गायन, ज्वेलरी, लक्जरी
बच्चा सुंदरता पसंद, कपड़े-खिलौने में ध्यान।

शनि लोहे, कानून, वकालत, इंजीनियरिंग, मेहनत वाले काम, IT, तेल
बच्चा धीरे सीखेगा पर जो सीखेगा पक्का, बचपन में शर्मीला।

राहु विदेशी भाषा, कोडिंग, AI, इलेक्ट्रॉनिक्स, जासूसी, शेयर मार्केट, अचानक वाले काम
बच्चा ट्रिक में तेज, नया गैजेट जल्दी सीखेगा।

केतु रिसर्च, साइंस, मेडिकल रिसर्च, आध्यात्म, मोक्ष वाले काम

नियम
5वें भाव में जो ग्रह है, या 5वें भाव के स्वामी के साथ जो ग्रह है, वही विषय।

5वां भाव मेष/वृश्चिक = मंगल के विषय, वृषभ/तुला = शुक्र के विषय, ऐसे ही।

2. नौकरी सरकारी या प्राइवेट? किस उम्र में?

सरकारी योग सूर्य + मंगल + बृहस्पति का संबंध 10वें भाव से। 10वें का स्वामी उच्च, सूर्य 10° के आसपास, मंगल 10वें में।

प्राइवेट/बिजनेस बुध + शुक्र + शनि का 10वें से संबंध। 10वें में चर राशि हो तो बिजनेस, स्थिर राशि हो तो नौकरी।

नौकरी लगने की उम्र D-10 से
शनि और 10वें स्वामी की दशा में नौकरी। गुरु की दशा में पढ़ाई पूरी।

3. कौन सी दशा सहयोग करती है?

बच्चे के लिए 3 दशा बहुत जरूरी

a) 12 से 22 साल – पढ़ाई की दशा
यदि इस समय बुध, गुरु, शुक्र की महादशा / अंतर्दशा आए तो पढ़ाई बहुत अच्छी।
शनि, राहु, केतु, मंगल की दशा इस समय आए तो पढ़ाई में ब्रेक, ध्यान भटकेगा।
उपाय – उस ग्रह का रत्न नहीं, उसकी चीज दान और पढ़ाई का माहौल बदलना।

b) 22 से 32 साल, नौकरी की दशा
इस समय 10वें स्वामी, 11वें स्वामी, लग्नेश, सूर्य, शनि की दशा नौकरी लगवाती है।
6ठा भाव नौकरी का है – 6ठे स्वामी की दशा में प्रतियोगिता में जीत।

c) सबसे बड़ा नियम, योगकारक दशा
हर लग्न का एक योगकारक ग्रह होता है –
👉मेष/वृश्चिक – गुरु + सूर्य
👉वृषभ/तुला – शनि + बुध
👉मिथुन/कन्या – शुक्र
👉कर्क/सिंह – मंगल + गुरु
👉मकर/कुंभ – शुक्र + बुध
👉धनु/मीन – मंगल + सूर्य

योगकारक की दशा में बच्चा टॉप करता है, नौकरी लगती है।

उदाहरण
कन्या लग्न का बच्चा। उसका योगकारक शुक्र। यदि 18 साल में शुक्र की महादशा शुरू हो गई तो बच्चा डिजाइन, CA, बैंकिंग में टॉप करेगा। उसी समय शनि की दशा आए तो इंजीनियरिंग, कानून में जाएगा।

4. माता-पिता क्या करें?

1. बच्चे की कुंडली में 5वां भाव खाली है तो 5वें स्वामी को देखो कहाँ है – उसी ग्रह का विषय दो।
2. जबरदस्ती साइंस मत दो – यदि 5वें में शुक्र/चंद्र है तो बच्चा आर्ट्स में टॉपर बनेगा, साइंस में फेल।
3. दशा देखकर विषय बदलो – 10वीं के बाद जो महादशा 5-6 साल चलेगी, उसी से जुड़ा कोर्स कराओ।

*पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए….?

*पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए….?

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।

इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।


भाग 1 – गरुड़ पुराण क्या कहता है – अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं –

“अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।”
अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और उसे खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो।

और दूसरा श्लोक –
“जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी।”

गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं –

1. जाति दोष – अन्न किसने उगाया? किस भाव से उगाया? अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।

2. निमित्त दोष – अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा – रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।

3. आश्रय दोष – अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।

पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।

भाग 2 – पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है? – सूक्ष्म विज्ञान

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं – सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।

वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।

आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है।

अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो –

  • उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा।
  • उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी।
  • उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।

इसलिए गरुड़ पुराण कहता है – पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक “पवित्र घड़ा” है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?

आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।

भाग 3 – 5 कारण – क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर – गरुड़ पुराण के अनुसार

कारण 1 – आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है

इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है – पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।

अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा – “स्वगृहे भोजनं कुर्यात्” – अपने घर का ही भोजन करो।

कारण 2 – दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है

पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।

गरुड़ पुराण कहता है – जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।

श्लोक है – “परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।” पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।

कारण 3 – कर्ज का सिद्धांत – अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज

सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।

पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है – देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज – मनुष्य का कर्ज – ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।

गरुड़ पुराण में कथा है – एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी – “मेरा काम हो जाए”, पितरों ने कहा – “तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।”

कारण 4 – प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है – जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं।

जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।

और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।

इसलिए पुराने लोग कहते थे – पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।

कारण 5 – आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है

गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत – अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है।

जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।

जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।

भाग 4 – किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए – गरुड़ पुराण की सूची

गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है –

  1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर – जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
  2. शराबी, मांसाहारी के घर – जहाँ जीव हत्या होती हो।
  3. पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में – जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
  4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर – जहाँ काम वासना का वास हो।
  5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर – उसका पैसा अपवित्र है।
  6. श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर – जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
  7. होटल, ढाबा, बाजार का भोजन – जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
  8. दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न – अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।

भाग 5 – क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए – पितृपक्ष का आहार विधान

तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है –

खाने योग्य –

  • अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
  • बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का – क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।
  • जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल।
  • एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
  • भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।

न खाने योग्य –

  • 16 दिन – मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।
  • बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।

जल का नियम –
पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।

कहा गया है – “जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।” दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।

भाग 6 – अपवाद – कब दूसरे के घर खा सकते हैं?

गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है –

1. गुरु के घर – अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।

2. पुत्री के घर – पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।

3. आपातकाल में – अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, “पितृभ्यो नमः” कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।

पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं – घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।

भाग 7 – आज के जीवन में कैसे पालन करें – प्रैक्टिकल उपाय

आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय –

1. टिफिन ले जाओ – 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।

2. फलाहार करो – अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।

3. मानसिक क्षमा मांगो – अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो – “हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।”

4. गायत्री मंत्र से शुद्धि – भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।

5. तुलसी दल डालो – कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।

अंतिम – पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व है

पितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।

गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में –

“पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।”
जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।

और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं – “धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।”

इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो – बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।

क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।

।। इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा ।।

जीवन को सुखी बनाने के 25 अचूक उपाय

जीवन को सुखी बनाने के 25 अचूक उपाय
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जीवन को सुखी बनाने संबंधी छोटे-छोटे उपाय जानिये ये 25 महत्वपूर्ण उपाय हम आपके लिए लाये हैं। जिन्हे आजमा कर आप भी अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बना सकते हैं।

  1. यदि कोई काम नहीं हो रहा है। बहुत बाधाएं आ रही हैं तो जिस दिन सोमवार की अष्टमी हो उस दिन 31 मूंग के दाने, 31 चावल के दाने और 31 बेलपत्र लेकर शिव मंदिर जाएं। अपनी मनोकामना बोलकर चावल को शिवजी के मंदिर की दहलीज पर रख दो। ऐसा रखो कि किसी का पैर नहीं लगे। मूंग के दाने को नंदी भगवान के उस पैर के पास रखो जो उनका पैर ऊंचा रहता है। 31 बेलपत्र जलाधारी में जहां से जल निकलता है उससे अशोक सुंदरी का स्थान कहते हैं। वहां पर उन बेलपत्रों को रख दो। अगली सोमवार की अष्टमी तक आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी।
  2. मंगलवार और बुधवार को लिया गया कर्ज कभी चुकता नहीं होता है। ऐसे में इन 2 दिनों में कर्ज न लेने की सलाह दी जाती है। ऋण से मुक्ति पाने के लिए मंगलवार को भगवान शिव को मसूर की दाल चढ़ाते हुए •ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः: मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे कर्ज से मुक्ति मिल जाती है।
  3. कई बार ऐसा होता है कि एक दुख से छुटकारा मिला कि दूसरा खड़ा हो जाता है। एक समस्या से मुक्ति मिली नहीं कि दूसरी सामने आ जाती है। ऐसे में प्रदोष के दिन प्रदोष काल में 2 जगहों पर दीपक लगाना प्रारंभ कर दें। पहला दीया बेलपत्र के वृक्ष के नीचे और दूसरे दीया अपने दरवाजे की चौखट के बाहर उस ओर जब हम घर में प्रवेश करें तो राइट हैंड पर लगाएं। दोनों ही जगह शिवजी से प्रार्थना करें कि हे नंदीश्वर आप जब भी प्रदोष काल में भ्रमण पर निकले तो मैंने भी आपके लिए द्वार सजाया है। थोड़ी दया मेरे घर की चौखट पर भी कर देना।
  4. किसी भी सोमवार, सोमवार की अष्टमी और शिवरात्रि पर गंभीर बीमारी से मुक्ति पाने के लिए शमी के फूल को नीलकंठेश्वर महादेव का नाम लेकर शिवलिंग पर अर्पित कर दें। इसके अलावा गाय का घी अर्पित कर दें। पांच कमलगट्टे और पांच बेलपत्र तांबे के लोटे में जल भरकर रख लें। सीधे हाथ में उस लोटे को रखो और •श्री शिवाय नमस्तुभ्यं। इस मंत्र का पांच बार स्मरण करके लोटे को माथे से लगाकर अपनी तकलीफ को मन में रखकर इस लौटे को अपने गांव, नगर आदि से दूर एकांत में जहां पर शिव मंदिर हो या किसी वृक्ष के नीचे शिवलिंग हो वहां पर उस शिवलिंग पर यह जल कमलगट्टे और बेलपत्र सहित अर्पित कर दें। उसमें से एक कमलगट्टे और बेलपत्र को उठाकर अपने घर पर लेकर आ जाओ और उसे पूजा घर में रखकर शिवजी का स्मरण करो।
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  5. शुक्रवार के दिन एक तांबे के लोटे में जल भरें। एक आंकड़े का फूल लें। दोनों को लेकर शिव मंदिर में जाएं और शिवलिंग पर सबसे पहले तांबे के लोटे का जल अर्पित करें। जल अर्पित करते समय श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र का जप करें। इसके बाद आंकड़े के फूल को जलाधारी में अशोक सुंदरी वाले स्थान पर अर्पित कर देना हैं।
  6. शुक्रवार को शमी के पत्ते को पहले शिवलिंग के पास अर्पित करें और फिर उसी पत्ते को उठाकर शिवलिंग के ऊपर •श्री शिवाय नमस्तुभ्यं मंत्र बोलते हुए अर्पित कर दें। महाशिवरात्रि के दिन जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर से दरिद्रता दूर भाग जाती है। शमी वृक्ष के पत्तों तथा चमेली के फूल से शिव जी का पूजन करने पर अपार धन-संपदा का आशीष मिलता है। महाशिवरात्रि पर सायंकाल के समय शिव मंदिर में दीया जलाने से धन संबंधी समस्याएं दूर होकर अपार धन-संपत्ति तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती हैं।
  7. श्रावण मास की दशमी तिथि को शमी के 11, 21 या 51 पत्ते लेकर शहद में डुबोकर शंकर भगवान के शिवलिंग का श्रृंगार करो। लिंगपुराण कहता है कि जब हम शमी के पत्ते को शहद में डुबोकर शिवलिंग का श्रृंगार करते हैं तो शंकर भगवान हमें कर्ज से मुक्ति दिलाते हैं।
  8. मंगलवार के दिन शिवलिंग को पके चावल से ढक दो और फिर उसके बाद उस पर 7 बेलपत्र अर्पित कर दो। ऐसा माना जाता है कि यह उपाय बहुत ही अचूक है और ऐसा करने से आपकी धन से जुड़ी सभी समस्याएं दूर होती है और आप कर्ज से मुक्ति हो जाएंगे। मां लक्ष्मी की कृपा आप सब पर बनी रहेगी।
  9. मंगलवार के दिन भगवान शिव को मसूर की दाल का भोग लगाना है और जब आप मसूर की दाल चढ़ाएं तो इस मंत्र का उच्चारण जरूर करें- •ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः। ऐसे करने से जल्द ही कर्ज से मुक्ति मिलेगी।
  10. एक चुटकी हल्दी और 2 हरी इलाइजी। दोनों इलाइची पर हल्दी का लेप लगा लें और अब दो आटे के दीपक लें और उसमें घी डालकर बाती लगा लें। अब पहला दीपक गणेशजी की प्रतिमा या चित्र के सामने •ॐ गं गणपतये नमः: का जाप करते हुए प्रज्वलित करें। उसमें एक हरी इलायची भी अर्पित कर दें। इस दौरान गणेशजी से कर्ज मुक्ति की कामना करें। अब तुलसी के गमले में थोड़ा सा गड्ढा करके दूसरी इलायची को दबा देना है और दूसरा दीपक उसी इलायची के ऊपर रखकर तुलसी माता के समक्ष •ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: या •ॐ महालक्ष्मी नमः: का 108 बार जाप करते हुए प्रज्वलित कर देना है। इस दौरान माता से धन समृद्धि की कामना भी करना है।
  11. •’एक लोटा जल सभी समस्या का हल’ यानी एक लोटा जल भगवान शिव को चढ़ाने से मनुष्य की सारी समस्याओं का निराकरण हो जाता है। शिवजी को जल अर्पित करते वक्त बिल्वपत्र पर शहद लगाकर चढ़ाना, आंकड़े का फूल चढ़ाना और चंदन अर्पित करना बहुत ही शुभ होता है।
  12. जो बिल्वपत्र भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है उसे फेंकना नहीं चाहिए अपितु उसे खा लेना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य रोग मुक्त हो जाता है।
  13. प्रति सोमवार के दिन भगवान शिव की आराधना करने से गृह कलह से पूरी तरह छुटकारा मिलता हैं।
  14. शिव पुराण के उपाय के अनुसार सोमवार के दिन भगवान शिव को बिल्वपत्र अर्पित करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद भी उस व्यक्ति पर हमेशा बना रहता है।
  15. सोमवार के दिन शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाने से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी प्रकार की समस्याएं हल कर देते हैं।
  16. यदि नेत्रों से संबंधित कोई भी परेशानी है तो महाशिवरात्रि के दिन रात को 12 बजे शहद के साथ बिल्वपत्र चढ़ाने और उस शहद को एक बर्तन में इकट्ठा करने के बाद अवधूतेश्वर महादेव का नाम लेकर उस शहद को 3 महीने तक नेत्रों में काजल की तरह लगाने पर आंखों की रोशनी में फायदा होता है।
  17. परिवार का कोई सदस्य गंभीर रोग से पीड़ित हैं तो शमी के पेड़ से एक फूल लेकर नीलकंठेश्वर महादेव का जाप करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए। इसके बाद नीलकंठेश्वर महादेव से थोड़ा जल लेकर उस रोगी के शरीर पर लगाना चाहिए। इस उपाय से रोगी को लाभ मिलता है।
  18. किसी की समय पर शादी नहीं हो पा रही है या विवाह में अड़चन आ रही हैं तो एक सूखा नारियल का गोला लेकर ऊपर की और से थोढ़ा सा ढक्कन की तरह काट लें। फिर इस नारियल में सत्यनारायण भगवान का प्रसाद या पंजीरी भरकर उसे कटे हुए भाग से बंद कर दें। इस नारियल को किसी पीपल के पेड़ के नीचे दबा दें। शिव जी की कृपा से उस व्यक्ति का विवाह बहुत जल्द ही हो जाएगा।
  19. परिवार को किसी सदस्या को अकाल मृत्यु से बचाना हैं तो आप नर्मदा नदी से निकले शिवलिंग को अपने घर के मंदिर में स्थापित कर उसकी नित्य पूजा करें। इससे आपके घर में कभी अकाल मृत्यु नहीं होगी।
  20. यदि किसी महिला को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही है तो उस महिला के रजस्वला यानी मासिक धर्म के सातवें दिन सफेद आंकड़े की जड़ को लेकर शिवलिंग पर 7 बार घुमाकर शिव जी का आह्वान करते हुए संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। फिर उस आंकड़े की जड़ को किसी लाल कपड़े में बांधकर महिला की कमर पर बांध दें। इस उपाय से शिवजी चाहेंगे तो जल्द ही गोद भर जाएगी।
  21. यदि बहुत सारा कर्ज है तो वट्केश्वर महादेव का नाम लें और थोड़े दिन तक वट वृक्ष के नीचे एक लोटा जल अर्पित करते रहें। धीरे धीरे कर्ज से जुड़ी सारी परेशानियां आपकी दूर हो जाएंगी।
  22. नजर दोष निवारण के लिए शिवरात्रि के दिन 12 कांटे वाला धतूरा लेकर इसको शिवलिंग पर सात बार फेरते हुए •’ओम नमः: शिवाय’ मंत्र का जाप करें। इसके बाद धतूरे को दुसरे दिन जिस जगह नजर लगी हैं। उस जगह पर लाल कपडे में बांधकर लटका दें। इससे नजर दोष दूर हो जाएगा।
  23. यदि आर्थिक तंगी से परेशान हैं तो बेलपत्र पर लाल चंदन लगाकर शिवलिंग पर चढ़ा दें। इससे माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं और उनके आशीर्वाद कभी भी आर्थिक तंगी नहीं होगी।
  24. गंभीर रोग से मुक्ति के लिए शिवरात्रि के दिन या सावन मास के सोमवार पर गोबरी को जलाकर राख कर दें। अब गोबरी की राख और गंगाजल को मिश्रित करके एक लेप जैसा तैयार करें। अब इसे रोगी के शरीर पर लगाएं। इससे रोग में फायदा होगा।
  25. यदि आपके सामने कोई बहुत बड़ी समस्या कर खड़ी हो जाए और उसका कोई हल नजर न आए तो शिव मंदिर के पास बेलपत्र का पेड़ ढूंढिए उस बेलपत्र के पेड़ के नीचे एक मूंग का दाना या एक चावल और साथ ही वहां पर जो भी एक कंकड़ रखा हो उसे भगवान शिव का स्वरूप मानकर लोटा भर जल अर्पित करें। जल अर्पित करने के बाद आप अपनी समस्या शिवजी के समक्ष रख दें। आपकी समस्या का जल्द ही निवारण होगा।

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए

पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए

सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।

इसलिए इस दौरान भोजन का नियम सबसे कठोर है।


भाग 1 – गरुड़ पुराण क्या कहता है – अन्न ही शरीर नहीं, अन्न ही मन है

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प, अध्याय 17 और 33 में भगवान विष्णु, गरुड़ जी को समझाते हैं –

“अन्नं ब्रह्म रसं विष्णुः भोक्ता देवो महेश्वरः।”
अन्न ब्रह्मा है, उसका रस विष्णु है, और उसे खाने वाला जीव, स्वयं महेश है। इसलिए अन्न को कभी सामान्य मत समझो।

और दूसरा श्लोक –
“जैसा अन्न वैसा मन, जैसा पानी वैसी वाणी।”

गरुड़ पुराण कहता है, अन्न के 3 दोष होते हैं, जो खाने वाले के अंदर चले जाते हैं –

1. जाति दोष – अन्न किसने उगाया? किस भाव से उगाया? अगर किसान ने लोभ, क्रोध से उगाया, तो वह भाव अन्न में आएगा।

2. निमित्त दोष – अन्न बनाते समय, बनाने वाले के मन में क्या था? अगर रसोई में झगड़ा हो रहा है, गाली दी जा रही है, तो वह अन्न विष बन जाता है। इसलिए कहा – रसोई में कभी अशुद्ध मन से भोजन मत बनाओ।

3. आश्रय दोष – अन्न किसके घर का है? किसके पैसे से आया? अगर वह पैसा पाप से, चोरी से, ब्याज से, धोखे से आया है, तो उस अन्न में पाप का अंश आ जाता है।

पितृपक्ष में यही तीसरा दोष, सबसे खतरनाक हो जाता है।

भाग 2 – पितृपक्ष में आपके साथ कौन रहता है? – सूक्ष्म विज्ञान

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद जीव के 2 शरीर बचते हैं – सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। पितृपक्ष में यमराज, पितरों को 16 दिन के लिए, पितृलोक से मुक्त करते हैं, वे अपने पुत्र-पौत्रों के घर आते हैं, उनके द्वार पर, उनकी रसोई में, उनकी छाया में रहते हैं।

वे कुछ खाते नहीं, वे केवल गंध और भाव ग्रहण करते हैं।

आप जो भी खाते हो, जो भी सोचते हो, उसका सूक्ष्म अंश, आपके पितरों को जाता है।

अब सोचो, आप किसी और के घर खाते हो –

  • उस घर में मांस-मदिरा बनता हो, तो उसका दोष आपके पितरों को जाएगा।
  • उस घर में पितरों का श्राद्ध न होता हो, पितर अतृप्त हों, तो उनकी अतृप्ति, ईर्ष्या, आपके पितरों से टकराएगी।
  • उस घर का पैसा, अगर अधर्म से आया है, तो आपके पितर भी उस पाप के भागी बनेंगे।

इसलिए गरुड़ पुराण कहता है – पितृपक्ष में पुत्र, पितरों के लिए एक “पवित्र घड़ा” है, अगर घड़ा गंदा हो गया, तो पितर जल कैसे पिएंगे?

आपका शरीर ही वह घड़ा है, और अन्न-जल ही उस घड़े का जल है।

भाग 3 – 5 कारण – क्यों नहीं खाना चाहिए दूसरों के घर – गरुड़ पुराण के अनुसार

कारण 1 – आपका शरीर पितरों के लिए यज्ञशाला बन जाता है

इन 16 दिनों में, जब आप तर्पण करते हो, पिंडदान करते हो, ब्राह्मण को भोजन कराते हो, तो आपके पितर, आपके माध्यम से ही तृप्त होते हैं। गरुड़ पुराण कहता है – पुत्र की नाभि से, एक सूक्ष्म नाड़ी, पितरों तक जाती है। जो पुत्र खाता है, वही पितरों को सूक्ष्म रूप में मिलता है।

अगर आप बाहर का, अपवित्र, रजोगुणी, तामसिक अन्न खाओगे, तो आपके पितरों को भी वही मिलेगा, वे तृप्त होने की जगह, और अशांत हो जाएंगे। इसलिए कहा – “स्वगृहे भोजनं कुर्यात्” – अपने घर का ही भोजन करो।

कारण 2 – दूसरे के घर का अन्न, आपके व्रत को तोड़ देता है

पितृपक्ष, एक व्रत है, 16 दिन का महाव्रत। जैसे नवरात्रि में 9 दिन व्रत में, आप बाहर का नहीं खाते, क्योंकि आप देवी के लिए पवित्र हो, वैसे ही पितृपक्ष में आप पितरों के लिए पवित्र हो।

गरुड़ पुराण कहता है – जो व्यक्ति पितृपक्ष में दूसरे के घर अन्न खाता है, उसका श्राद्ध, पितर ग्रहण नहीं करते, उसके पिंड, कौवे भी नहीं खाते, क्योंकि उसके पिंड में, दूसरे के घर की अशुद्धि आ जाती है।

श्लोक है – “परान्नं च परवस्त्रं परशय्या परस्त्रियः, पितृपक्षे विवर्जयेत्।” पितृपक्ष में दूसरे का अन्न, दूसरे का वस्त्र, दूसरे की शय्या, और परस्त्री का संग, त्याग देना चाहिए।

कारण 3 – कर्ज का सिद्धांत – अन्न का कर्ज सबसे बड़ा कर्ज

सनातन धर्म में, अन्न का कर्ज, कभी न उतरने वाला कर्ज माना गया है। आपने किसी के घर खाया, तो आप उसके कर्जदार हो गए, सूक्ष्म रूप से।

पितृपक्ष में, आपको केवल 3 के कर्जदार रहना है – देव कर्ज, ऋषि कर्ज, पितृ कर्ज। अगर आपने चौथा कर्ज – मनुष्य का कर्ज – ले लिया, दूसरे के घर खाकर, तो आपके पितृ, आपको श्राप देकर जाएंगे, क्योंकि आपने उनका हिस्सा, दूसरे को दे दिया।

गरुड़ पुराण में कथा है – एक ब्राह्मण ने पितृपक्ष में अपने मित्र के घर खीर खाई, उसके पितर, भूखे ही पितृलोक लौट गए, क्योंकि उस खीर पर, मित्र की कामना थी – “मेरा काम हो जाए”, पितरों ने कहा – “तूने हमारा अन्न, दूसरे की कामना को दे दिया, जा, तुझे पितृदोष लगेगा।”

कारण 4 – प्रेत और पिशाच बाधा से बचाव

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में, प्रेतों के 18 प्रकार बताता है – जो पितृपक्ष में सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं, क्योंकि इस दौरान यमलोक के द्वार खुले होते हैं।

जब आप किसी अनजान घर, होटल, ढाबे, या ऐसे घर में खाते हो, जहाँ का शुद्ध-अशुद्ध पता नहीं, जहाँ लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा बनता हो, तो उस अन्न के साथ, प्रेतों की सूक्ष्म ऊर्जा, आपके शरीर में प्रवेश कर जाती है।

और जब आपके शरीर में पितर भी हैं, और बाहर से प्रेत भी आ गया, तो दोनों में युद्ध होता है, इसी को पितृदोष, नजर दोष, घर में क्लेश कहा जाता है।

इसलिए पुराने लोग कहते थे – पितृपक्ष में होटल का मत खाओ, बाहर का मत खाओ, अपने हाथ से बना, सादा, सात्विक खाओ।

कारण 5 – आपके पुण्य का ट्रांसफर हो जाता है

गरुड़ पुराण का सबसे गुप्त सिद्धांत – अन्न दान, पुण्य का ट्रांसफर है।

जब आप किसी के घर खाते हो, तो अनजाने में, आपका 1 दिन का श्राद्ध-पुण्य, उस घर के पितरों को चला जाता है, और आपके पितर खाली हाथ रह जाते हैं।

जैसे मोबाइल से पैसा ट्रांसफर होता है, वैसे ही अन्न से पुण्य ट्रांसफर होता है, इसलिए पितृपक्ष में केवल उसी के घर खाना चाहिए, जिसके पितर, आपके पितरों के मित्र हों, यानी आपका अपना परिवार, आपका अपना घर।

भाग 4 – किन-किन जगहों पर बिल्कुल नहीं खाना चाहिए – गरुड़ पुराण की सूची

गरुड़ पुराण में, 8 जगहों का अन्न, पितृपक्ष में महापाप बताया गया है –

  1. शूद्र या अपवित्र व्यक्ति के घर – जहाँ शौच-अशौच का ध्यान न हो।
  2. शराबी, मांसाहारी के घर – जहाँ जीव हत्या होती हो।
  3. पुत्रहीन, श्राद्धहीन घर में – जहाँ कभी पितरों के नाम पर दीया भी न जलता हो, वहाँ के पितर अतृप्त हैं, वे आपका पुण्य छीन लेंगे।
  4. वेश्या, परस्त्रीगामी के घर – जहाँ काम वासना का वास हो।
  5. ब्याज, चोरी, रिश्वत से कमाने वाले के घर – उसका पैसा अपवित्र है।
  6. श्राद्ध के दिन, निमंत्रण के बिना, दूसरे के घर – जो श्राद्ध में बिना बुलाए जाता है, वह पाप खाता है।
  7. होटल, ढाबा, बाजार का भोजन – जहाँ बनाने वाले का पता नहीं, वहाँ 100 लोगों की वासना, उस अन्न में होती है।
  8. दूसरे के श्राद्ध का बचा हुआ अन्न – अगर किसी और ने अपने पितरों के नाम पर ब्राह्मण को खिलाया, और वह बच गया, उसे कभी मत खाओ, वह सीधे पितरों का अन्न है, उसे खाने से पितृदोष लगता है।

भाग 5 – क्या खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए – पितृपक्ष का आहार विधान

तो फिर खाना क्या चाहिए? गरुड़ पुराण, अध्याय 21 में आहार विधान देता है –

खाने योग्य –

  • अपने घर में, अपने हाथ से, या पत्नी, माता, पुत्री के हाथ से बना, गाय के घी में बना, सादा भोजन।
  • बिना लहसुन-प्याज का, बिना मसूर, उड़द, चना, हींग का – क्योंकि ये तामसिक हैं, पितरों को उत्तेजित करते हैं।
  • जौ, चावल, गेहूं, मूंग, गाय का दूध, दही, घी, शहद, फल, कंद-मूल।
  • एक बार भोजन, ब्रह्म मुहूर्त में नहीं, दिन में एक बार, सात्विक।
  • भोजन से पहले, अपने पितरों के नाम पर, गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी के लिए, थोड़ा निकालना, जिसे पंचबलि कहते हैं।

न खाने योग्य –

  • 16 दिन – मांस, मछली, अंडा, शराब, लहसुन, प्याज, मसूर, चना, उड़द, बैंगन, लौकी (कुछ जगह), पान, तंबाकू।
  • बासी, जूठा, दोबारा गर्म किया हुआ भोजन।

जल का नियम –
पितृपक्ष में पानी भी, किसी के घर का नहीं पीना चाहिए, खासकर जो तामसिक हो। अपना पानी, अपने घर का, या गंगा जल, या कुएं का साफ पानी। क्योंकि जल भी, अन्न की तरह, भाव ग्रहण करता है।

कहा गया है – “जलं पीत्वा परगृहे, पितृणां तृप्ति नश्यति।” दूसरे के घर जल पीने से, पितरों की तृप्ति नष्ट हो जाती है।

भाग 6 – अपवाद – कब दूसरे के घर खा सकते हैं?

गरुड़ पुराण, कठोर है, पर करुण भी है, 3 अपवाद देता है –

1. गुरु के घर – अपने गुरु, आचार्य, ज्ञानी ब्राह्मण के घर, पितृपक्ष में खा सकते हैं, क्योंकि गुरु का अन्न, अमृत है, वह आपके पितरों को भी तृप्त करता है।

2. पुत्री के घर – पिता, अपनी विवाहित पुत्री के घर, पितृपक्ष में अन्न नहीं खाता, यह नियम है, पर पुत्री, अपने पिता के घर खा सकती है, क्योंकि पुत्री का संबंध, पिता के पितरों से भी है।

3. आपातकाल में – अगर आप यात्रा में हो, बीमार हो, और अपना भोजन संभव नहीं, तो फल, दूध, गंगा जल लेकर, “पितृभ्यो नमः” कहकर, भगवान विष्णु को अर्पण करके, खा सकते हैं, दोष नहीं लगेगा, क्योंकि भाव शुद्ध है।

पर होटल, मित्र के घर पार्टी, शादी, बर्थडे में, पितृपक्ष में जाना, और वहां खाना, गरुड़ पुराण में महादोष कहा गया है, इससे पितृ नाराज होकर, पितृदोष देते हैं – घर में क्लेश, संतान बाधा, धन हानि, बीमारी।

भाग 7 – आज के जीवन में कैसे पालन करें – प्रैक्टिकल उपाय

आज तो नौकरी है, बाहर रहना पड़ता है, तो कैसे करें? 5 उपाय –

1. टिफिन ले जाओ – 16 दिन, अपने घर से टिफिन ले जाओ, ऑफिस में भी अपना ही खाओ।

2. फलाहार करो – अगर बाहर हो, तो केवल फल, दूध, मूंगफली, गंगा जल, तुलसी दल लो, यह पवित्र है।

3. मानसिक क्षमा मांगो – अगर गलती से, बाहर खा लिया, तो रात को, दक्षिण दिशा में मुंह करके, हाथ में जल लेकर, कहो – “हे मेरे पितरो, आज मैंने अज्ञान में, परान्न ग्रहण किया, मुझे क्षमा करो, मैं कल से ध्यान रखूंगा, और इसके प्रायश्चित में, मैं एक ब्राह्मण को भोजन कराऊंगा, या गाय को चारा दूंगा।”

4. गायत्री मंत्र से शुद्धि – भोजन से पहले, 3 बार गायत्री मंत्र पढ़कर, भोजन पर फूंक मारो, तो उसका दोष 50% कम हो जाता है, यह गरुड़ पुराण का ही उपाय है।

5. तुलसी दल डालो – कोई भी भोजन, जल, अगर बाहर का लेना ही पड़े, तो उसमें तुलसी का पत्ता डाल दो, तुलसी, विष्णु प्रिया है, वह हर अन्न को पवित्र कर देती है, प्रेत बाधा नहीं आने देती।

अंतिम – पितृपक्ष, भूखे रहने का नहीं, पवित्र रहने का पर्व है

पितृपक्ष, डरने का पर्व नहीं, प्रेम का पर्व है, 16 दिन, आपके पितर, आपके मेहमान हैं, जैसे घर में मेहमान आए तो आप घर साफ रखते हो, बाहर का गंदा नहीं खाते, वैसे ही।

गरुड़ पुराण का सार, एक ही लाइन में –

“पितृपक्षे परान्नं यस्तु भुंक्ते मोहात् नराधमः, तस्य पितरो निराशा वै प्रयान्ति यममंदिरम्।”
जो मनुष्य, मोहवश, पितृपक्ष में दूसरे का अन्न खाता है, उसके पितर निराश होकर, यमलोक लौट जाते हैं, और उसे श्राप देकर जाते हैं।

और जो व्यक्ति, 16 दिन, अपने घर का, पवित्र, सात्विक अन्न, पितरों को याद करके खाता है, उसके पितर, उसे आशीर्वाद देते हैं – “धनं धान्यं संतानं, सुखं समृद्धि वर्धताम्।”

इसलिए इस पितृपक्ष, प्रण लो – बाहर का नहीं, अपना खाऊंगा, पवित्र खाऊंगा, पितरों को तृप्त करूंगा।

क्योंकि अन्न ही मन है, और मन ही पितरों तक जाता है।

।। इति गरुड़ पुराणोक्त पितृपक्ष परान्न निषेध कथा संपूर्णा ।।

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