12 आदित्य और उनके मंत्र
12 आदित्य और उनके मंत्र (12 Aditya Mantras)
- धाता आदित्य मंत्र:
- ॐ धात्रे नमः (सृष्टि के पालनकर्ता व रचयिता)
- मित्र आदित्य मंत्र:
- ॐ मित्राय नमः (सबके मित्र और स्नेह बढ़ाने वाले)
- अर्यमा आदित्य मंत्र:
- ॐ अर्यम्णे नमः (समाज और नियम के देवता)
- वरुण आदित्य मंत्र:
- ॐ वरुणाय नमः (जल और जीवन के नियंत्रक)
- इंद्र आदित्य मंत्र:
- ॐ इंद्राय नमः (बल और ऐश्वर्य के दाता)
- विवस्वान (विवस्वान्) आदित्य मंत्र:
- ॐ विवस्वते नमः (अग्नि और तेज के प्रतीक)
- पूषा आदित्य मंत्र:
- ॐ पूष्णे नमः (पोषण और वृद्धि करने वाले)
- पर्जन्य आदित्य मंत्र:
- ॐ पर्जन्याय नमः (वर्षा और जीवनदाता)
- त्वष्टा आदित्य मंत्र:
- ॐ त्वष्ट्रे नमः (शिल्प और निर्माण के देवता)
- विष्णु आदित्य मंत्र:
- ॐ विष्णवे नमः (सर्वव्यापक शक्ति)
- अंशमान (अंशूमान) आदित्य मंत्र:
- ॐ अंशमते नमः (किरणों के देवता)
- सविता आदित्य मंत्र:
- ॐ रवये नमः / ॐ सवित्रे नमः (ऊर्जा और स्फूर्ति के प्रदाता)
(नोट: इन बारह नामों का जाप करने से स्वास्थ्य, तेज, मान-सम्मान और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।)
शुक्र पर ग्रहों का प्रभाव और प्रेम में आपकी सबसे बड़ी कमजोरी
शुक्र पर ग्रहों का प्रभाव और प्रेम में आपकी सबसे बड़ी कमजोरी
अगर आप किसी से प्रेम करते हैं, तब आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या बनती है,
सामने वाले से बहुत ज्यादा भावनात्मक जुड़ जाना, उसके ऊपर अधिकार जताना, हर बात का मतलब निकालना, जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएँ रखना, प्रेम में अस्वीकार होने से डरना या ऐसे व्यक्ति के पीछे उलझ जाना जिसे पाना आसान नहीं है।
इसमें शुक्र पर प्रभाव डालने वाले ग्रह की प्रकृति भी दिखाई देती है।
जन्मकुंडली में शुक्र प्रेम, आकर्षण, संबंधों में सुख, पसंद, रोमांस और किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षित होकर उससे जुड़ने की प्रवृत्ति का प्रमुख कारक माना जाता है।
चंद्रमा बताता है कि प्रेम में भावनात्मक जुड़ाव कितना गहरा होगा, मंगल आकर्षण, इच्छा और अधिकार की भावना से, बुध बातचीत और मानसिक जुड़ाव से तथा पंचम और सप्तम भाव प्रेम और संबंधों की वास्तविक परिस्थितियों से संबंधित हैं।
शुक्र के साथ किसी ग्रह की युति, उस ग्रह की दृष्टि शुक्र पर पड़ने अथवा कुंडली में शुक्र के साथ उसका अन्य स्पष्ट संबंध बनने पर प्रेम के व्यवहार में उस ग्रह की प्रकृति दिखाई देती है।
शुक्र को सूर्य प्रभावित करे तो जातक प्रेम में केवल अपनापन नहीं चाहता, बल्कि यह भी चाहता है कि साथी उसे महत्व और सम्मान दे। साथी उसकी योग्यता की प्रशंसा करे, उसके व्यक्तित्व को स्वीकार करे और संबंध में उसकी एक विशेष जगह हो।यह उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी उपेक्षा या महत्व न मिलने को दिल पर लेना बन सकती है।
सूर्य शुभ और बली हो तो व्यक्ति प्रेम में अपने आत्मसम्मान की स्वस्थ सीमा बनाए रखता है और साथी को भी पर्याप्त सम्मान देता है। सूर्य निर्बल हो तथा शनि, राहु या केतु की युति-दृष्टि से अधिक प्रभावित हो, तो साथी की छोटी उपेक्षा को भी अपने महत्व में कमी समझने, प्रेम में अहं की समस्या आने या बार-बार यह जानने की इच्छा बढ़ सकती है कि सामने वाला उसे कितना महत्व देता है।
शुक्र को चंद्रमा प्रभावित करे तो जातक प्रेम में भावनात्मक रूप से बहुत गहराई से जुड़ सकता है। साथी का बोलने का तरीका, समय देना, संदेश भेजना, हालचाल पूछना और भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहना उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी साथी के व्यवहार से अपनी मनःस्थिति को बहुत अधिक जोड़ लेना हो सकती है।
चंद्रमा शुभ, बली और स्थिर हो तो व्यक्ति प्रेम में संवेदनशील होने के बावजूद भावनात्मक संतुलन बनाए रखता है और साथी की प्रत्येक छोटी बात को रिश्ते में बदलाव का संकेत नहीं मानता। चंद्रमा बहुत क्षीण हो तथा शनि, राहु या केतु की युति-दृष्टि से पीड़ित हो, तो साथी के थोड़े दूर होने, देर से जवाब देने या व्यवहार बदलने पर असुरक्षा, बेचैनी और बार-बार उसी बात को सोचने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
शुक्र को मंगल प्रभावित करे तो जातक प्रेम में आकर्षण और इच्छा को बहुत तीव्रता से महसूस कर सकता है। किसी व्यक्ति को पसंद करने पर उसके करीब आने और संबंध को आगे बढ़ाने की इच्छा तेज होती है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी आकर्षण और जुनून में जल्दबाजी करना अथवा साथी पर अधिकार की भावना बढ़ जाना हो सकती है।
मंगल शुभ और बली हो तो व्यक्ति प्रेम में साहसी, स्पष्ट और अपने साथी के लिए खड़ा रहने वाला होता है। मंगल शनि या राहु की युति-दृष्टि से प्रभावित हो और शुक्र भी निर्बल हो, तो ईर्ष्या, क्रोध, अधिकार जताने, साथी से तुरंत प्रतिक्रिया चाहने या तीव्र शारीरिक आकर्षण के कारण रिश्ते की वास्तविकता समझने से पहले बहुत अधिक जुड़ जाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
शुक्र को बुध प्रभावित करे तो जातक प्रेम में बातचीत और मानसिक जुड़ाव को बहुत महत्व देता है। सामने वाला कैसे बात करता है, कितना समझदार है, कितना हँसाता है और उससे कितनी सहज बातचीत होती है – यह आकर्षण का महत्वपूर्ण कारण बन सकता है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी रिश्ते की हर छोटी बात का जरूरत से ज्यादा विश्लेषण करना हो सकती है।
बुध शुभ और बली हो तो व्यक्ति प्रेम में अपनी भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है और बातचीत से रिश्ते की समस्याओं को सुलझाने की क्षमता रखता है। बुध अस्त, अत्यधिक निर्बल अथवा राहु-केतु की युति-दृष्टि से प्रभावित हो और शुक्र भी कमजोर हो, तो संदेश के शब्दों, जवाब मिलने के समय, बोलने के तरीके और छोटी-छोटी बातों के अर्थ निकालकर स्वयं को उलझाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
शुक्र को गुरु प्रभावित करे तो जातक प्रेम में अच्छे चरित्र, विश्वास, समझदारी, संस्कार और भविष्य की स्थिरता को महत्व देता है। वह केवल आकर्षण से संतुष्ट नहीं होता, बल्कि चाहता है कि साथी उसके जीवन-मूल्यों के अनुरूप भी हो। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी साथी से बहुत ऊँची अपेक्षाएँ रखना हो सकती है।
गुरु शुभ और बली हो तो व्यक्ति प्रेम में उदार, समझदार और क्षमा करने वाला होता है तथा संबंध को सही दिशा देने की कोशिश करता है। गुरु निर्बल हो और राहु या शनि की युति-दृष्टि से प्रभावित हो, तो अपने मन में आदर्श साथी की ऐसी छवि बना सकता है जिसे वास्तविक व्यक्ति के लिए पूरा करना कठिन हो। कई बार साथी को लगातार समझाने, सुधारने या अपने विचारों के अनुसार चलाने की कोशिश भी बढ़ सकती है।
शुक्र को शनि प्रभावित करे तो जातक प्रेम में जल्दी भरोसा करने की अपेक्षा पहले सामने वाले की गंभीरता और स्थिरता को परखना चाहता है। प्रेम होने के बावजूद भावनाएँ व्यक्त करने में समय लग सकता है और संबंध टूटने या अस्वीकार किए जाने का भय भीतर रह सकता है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी दिल खोलने से पहले जरूरत से ज्यादा सुरक्षा तलाशना हो सकती है।
शनि शुभ और बली हो तो व्यक्ति प्रेम में जिम्मेदार, वफादार और लंबे समय तक संबंध निभाने वाला होता है। शनि राहु या केतु की युति-दृष्टि से अधिक प्रभावित हो और शुक्र भी निर्बल हो, तो पुराने भावनात्मक दुख को लंबे समय तक पकड़े रखने, प्रेम होते हुए भी दूरी बनाए रखने या सामने वाले पर भरोसा करने में अत्यधिक समय लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
शुक्र को राहु प्रभावित करे तो जातक के प्रेम और आकर्षण में तीव्रता बढ़ सकती है। सामान्य से अलग, रहस्यमय, सामाजिक रूप से अलग पृष्ठभूमि वाला अथवा आसानी से उपलब्ध न होने वाला व्यक्ति विशेष आकर्षण पैदा कर सकता है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी जिस व्यक्ति या रिश्ते को पाना कठिन हो, उसी के पीछे अधिक उलझ जाना हो सकती है।
शुक्र-राहु की निकट युति हो और शुक्र को गुरु, चंद्रमा अथवा अन्य शुभ प्रभाव का सहारा न मिले, तो आकर्षण को प्रेम समझने, सामने वाले को वास्तविकता से अधिक विशेष मानने या अनिश्चित रिश्ते में भी उम्मीद बनाए रखने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। कई बार जो व्यक्ति आसानी से उपलब्ध और स्थिर है, उसकी अपेक्षा जो दूरी बनाए रखता है वही मन पर अधिक प्रभाव डाल सकता है। एस्ट्रो अनन्या
शुक्र को केतु प्रभावित करे तो जातक प्रेम में ऐसी स्थिति अनुभव कर सकता है जिसमें आकर्षण होने के बावजूद भीतर किसी अनजानी कमी का अनुभव बना रहता है। किसी व्यक्ति की ओर बहुत आकर्षण हो सकता है, लेकिन संबंध बनने के बाद वही तीव्रता अचानक कम भी हो सकती है। इसलिए प्रेम में सबसे बड़ी कमजोरी अपनी ही भावनाओं को स्पष्ट रूप से न समझ पाना हो सकती है।
शुक्र-केतु की निकट युति हो और शुक्र को गुरु, चंद्रमा अथवा अन्य शुभ ग्रहों का सहारा न मिले, तो व्यक्ति कभी बहुत अधिक जुड़ सकता है और कभी अचानक भावनात्मक दूरी बना सकता है। सामने वाला यह समझ नहीं पाता कि संबंध में ऐसा क्या बदल गया, जबकि जातक स्वयं भी कई बार अपनी असंतुष्टि का स्पष्ट कारण नहीं समझ पाता।
शुक्र स्वयं मजबूत हो
शुक्र अपनी राशि वृषभ या तुला में, उच्च राशि मीन में अथवा अन्य प्रकार से शुभ और बलवान हो, तो व्यक्ति प्रेम और संबंधों में अपनी पसंद तथा जरूरतों को अपेक्षाकृत बेहतर समझता है। वह आकर्षण और वास्तविक संबंध के बीच अंतर करने की क्षमता रखता है तथा प्रेम में देने और पाने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
लेकिन मजबूत शुक्र का अर्थ यह नहीं कि प्रेम जीवन में कभी कमजोरी नहीं होगी। यदि शुक्र पर मंगल या राहु का बहुत अधिक प्रभाव हो अथवा चंद्रमा, पंचम भाव और सप्तम भाव भी शनि, राहु या केतु से पीड़ित हों, तो मजबूत आकर्षण क्षमता के साथ प्रेम में अत्यधिक आसक्ति, अपेक्षा या भावनात्मक उलझन भी दिखाई दे सकती है।
शुक्र पर एक से अधिक ग्रहों का प्रभाव हो
तब प्रेम में कमजोरी भी मिश्रित रूप लेती है। शुक्र-चंद्र-मंगल संबंध में जातक भावनात्मक और शारीरिक दोनों स्तर पर जल्दी गहराई से जुड़ सकता है तथा साथी की दूरी सहन करना कठिन हो सकता है। शुक्र-बुध-राहु संबंध में बातचीत से आकर्षण बहुत तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन हर संदेश और व्यवहार का जरूरत से ज्यादा अर्थ निकालने की प्रवृत्ति भी रह सकती है। शुक्र-गुरु-शनि संबंध में जातक गंभीर और स्थायी प्रेम चाहता है, लेकिन साथी को चुनने में बहुत ऊँचे मानक और भरोसा करने में अधिक समय उसकी कमजोरी बन सकते हैं। शुक्र-मंगल-राहु संबंध में तीव्र आकर्षण, जुनून और कठिन व्यक्ति को पाने की इच्छा बहुत बढ़ सकती है, जबकि शुक्र-शनि-केतु संबंध में प्रेम की इच्छा होने के बावजूद भावनात्मक दूरी और अस्वीकार होने का डर व्यक्ति को पूरी तरह खुलने से रोक सकता है।
प्रेम में आकर्षित होना और प्रेम को निभाना दो अलग बातें हैं। शुक्र बताता है कि व्यक्ति प्रेम, आकर्षण और संबंधों में सुख को किस प्रकार अनुभव करता है। चंद्रमा बताता है कि भावनात्मक जुड़ाव कितना गहरा होगा; मंगल बताता है कि इच्छा, जुनून और अधिकार की भावना कितनी तेज होगी और बुध बताता है कि बातचीत तथा मानसिक जुड़ाव कितना महत्वपूर्ण होगा।
शनि यह दिखाता है कि प्रेम में सुरक्षा, समय और स्थिरता की आवश्यकता कितनी है। इसलिए शुक्र के साथ चंद्रमा, मंगल, बुध, शनि, पंचम भाव, सप्तम भाव और इन पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव को साथ देखकर ही प्रेम में व्यक्ति की वास्तविक कमजोरी समझनी चाहिए।
भद्रा आज
भद्रा आज
हिंदू पंचांग और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा एक विशेष अशुभ समय या करण (विष्टि करण) को कहा जाता है। इस दौरान किसी भी तरह के शुभ, मांगलिक और नए कार्य करना वर्जित माना जाता है।
पौराणिक कथा और परिचय
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा को सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया की पुत्री तथा शनिदेव की बहन माना गया है।
इनका स्वभाव बहुत क्रोधी और उग्र बताया गया है।
इनका जन्म राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ था।
भद्रा का वास और प्रभाव
भद्रा का वास तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) में होता है। चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तय होता है कि भद्रा कहाँ है:
पृथ्वी लोक: जब भद्रा पृथ्वी पर होती है, तब इसे सबसे ज्यादा अशुभ माना जाता है। इस दौरान किए गए कार्यों में असफलता या हानि की आशंका रहती है।
स्वर्ग और पाताल लोक: जब भद्रा स्वर्ग या पाताल लोक में होती है, तब इसका पृथ्वी के मनुष्यों पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।
वर्जित कार्य
भद्रा काल में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और रक्षाबंधन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस अवधि में किए गए कार्यों में बाधा या रुकावट आती है।
शक और ज्योतिष
शक और ज्योतिष
=^=^=^=^=^
💑विवाह और प्रेम मे सबसे Negative है शक
💫कौन से ग्रह शक पैदा करते है
🌃चंद्र बुध और शुक्र
♨और इनको हवा देते है शनि और राहु
राहु तो शक कॊ बहुत ही बढ़ा देता है ।
🌃चंद्र कमजोर हो
🌄बुध कमजोर हो
👐पतली और लम्भी fingers हो
✊हथेली का रंग काला पड़ रहा हो तो negative सोच बढ़ जाती है ।
⏳मुलांक 2,4,6,7 मुलाँक हो तो शक जल्दी करते है ।
🌹अगर गुरु कुंडली मे अच्छा हो तो शक से बाहर आ जाते है
🌹शनि प्रधान हो या राहु प्रधान हो तो सम्बन्ध टूट जाते है ।
🌹अँगूठा छोटा हो तो भयंकर शक करते है ।
🌹अगर कुंडली मे बुध और चंद्र अच्छे होंगे तो शक से बाहर आ जाते है ।
🌹मुलाँक 1,5,9 वाले भी जल्दी बाहर आ जाते है।
उपाय
=^=^
👉बातो कॊ घुमा कर ना कहे ।
👉straight बात करे ।
👉मूंगा और रूबी नही पहने ।
👉गायत्री मंत्र का पाठ करे
👉पूर्णिमा पर व्रत करे ।
👉रात कॊ सोने से पहले प्राथना करे य meditation करे ।
Astro Shaliini
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गणेश उत्सव के दौरान रोज़ #प्रार्थना व #क्षमा प्रार्थना करें
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प्रार्थना- ‘हे विघ्नेश्वर गणनाथ! आप विघ्नों पर शासन करने वाले हैं। वर प्रदाता हैं, देवताओं के प्रिय हैं, संपूर्ण जगत के हितैषी हैं, गजानन हैं।
‘हे विनायक! आप ज्ञानस्वरूप मुनियों के ध्येय तथा गुणातीत हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। बारंबार नमस्कार है।’
‘हे देव! आप सदा मेरे समस्त कार्यों में विघ्न का निवारण करें।’
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क्षमा प्रार्थना-
पूजन में जाने-अनजाने, भूल, प्रमाद, आलस्य, विधि की जानकरी के अभाव इत्यादि से जो त्रुटि हो जाती है, उसके लिए क्षमा प्रार्थना की जाती है। इस हेतु हाथ जोड़कर निम्न मंत्र बोलें-
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मंत्र- ‘हे प्रभो! न मुझे भक्ति का ज्ञान है न मंत्र का। अहो! न मुझे स्तुति का ज्ञान है न आवाहन का। स्वभाव से भी मैं आलसी हूँ, नाना प्रकार की पूजन सामग्रियों से कभी विधिपूर्वक आपकी पूजा भी मुझसे न हो सकी।’
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‘हे नाथ! ज्ञान अथवा अज्ञान से यथाशक्ति जो भी आपका पूजन किया है, कृपा करके उसे परिपूर्ण पूजन के रूप में ग्रहण करना एवं मेरी त्रुटियों को क्षमा करना। मेरे इस पूजन से हे सर्वात्मा गणपति! आप मुझ पर प्रसन्न रहें।’
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आखिरी में प्रणाम एवं पूजा समर्पण
पूजा के अंत में साष्टांग प्रणाम करना चाहिए एवं पूजन कर्म परमेश्वर को समर्पित करना चाहिए।
(पहले साष्टांग प्रणाम करें, पश्चात हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलकर हाथ का जल, जल पात्र में छोड़ दें)-
मंत्र- ॐ शांतिः ॐ शांतिः ॐ शांतिःॐ आनंद ॐ आनंद ॐ आनंद
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विदेश में पढ़ाई
👉ज्योतिष शास्त्र में विदेश में पढ़ाई के लिए कुंडली में कुछ खास ग्रहों और भावों की स्थिति को देखा जाता है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, इसके लिए मुख्य रूप से चतुर्थ (शिक्षा), नवम (उच्च शिक्षा/लंबी यात्रा) और द्वादश (विदेश) भाव का मजबूत होना जरूरी है
विदेश में पढ़ाई के योग बनने के प्रमुख ज्योतिषीय सूत्र और नियम🖊️👇
1. भावों का मुख्य संबंध
चतुर्थ और द्वादश भाव का संबंध
यदि चौथे भाव (प्रारंभिक शिक्षा/घर) का स्वामी 12वें भाव (विदेश) में बैठा हो, या 12वें का स्वामी चौथे में हो, तो छात्र पढ़ाई के लिए घर से दूर विदेश जाता है।
नवम और द्वादश भाव का संबंध
कुंडली का 9वां भाव उच्च शिक्षा का होता है। जब 9वें और 12वें भाव के स्वामियों का आपस में राशि परिवर्तन, युति (साथ बैठना) या दृष्टि संबंध हो, तो यह उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने का सबसे मजबूत सूत्र बनता है।
पंचम और एकादश भाव
पांचवां भाव बुद्धि और विद्या का है। यदि इसका संबंध भी 9वें या 12वें भाव से हो जाए, तो पढ़ाई के लिए वीज़ा आसानी से मिल जाता है।
2. महत्वपूर्ण ग्रह
राहु
राहु को विदेशी भूमि, नई संस्कृति और आउट-ऑफ-बॉक्स चीज़ों का कारक माना जाता है ,यदि राहु कुंडली के 1वें, 7वें, 9वें या 12वें भाव में शुभ स्थिति में हो, तो व्यक्ति को पढ़ाई या करियर के लिए विदेश खींच ले जाता है
बृहस्पति
गुरु ज्ञान और उच्च शिक्षा के कारक हैं। गुरु का संबंध यदि 9वें या 12वें भाव से हो, तो छात्र स्कॉलरशिप या अच्छे संस्थानों में दाखिला पाकर विदेश जाता है।
चंद्रमा🌙
चंद्रमा मन के कारक और चर (travel) ग्रह हैं। कुंडली के 12वें भाव में चंद्रमा की स्थिति या 9वें भाव पर दृष्टि विदेश यात्रा के योग बनाती है
3. ग्रहों की दशा
कुंडली में योग चाहे जितने भी हों, वे तभी फलित होते हैं जब सही समय पर उनकी महादशा या अंतर्दशा आए।यदि कॉलेज की पढ़ाई के समय (18 से 25 वर्ष की उम्र में) 9वें या 12वें भाव के स्वामियों की दशा चल रही हो।या फिर इस दौरान राहु की महादशा/अंतर्दशा आ जाए, तो विदेश जाने के रास्ते तुरंत खुल जाते है
योग को मजबूत करने के उपाय🖊️
यदि आपकी कुंडली में रुकावटें आ रही हैं, तो ज्योतिष में ये उपाय बताए जाते हैं
राहु और गुरु को मजबूत करें ॐ बृहस्पतये नमः मंत्र का जाप करें। राहु की शांति या मजबूती के लिए शनिवार को पक्षियों को बाजरा डालें।
हनुमान चालीसा का पाठ📿
यात्रा में आने वाले विघ्नों (जैसे वीज़ा रिजेक्शन) को दूर करने के लिए रोज़ हनुमान चालीसा पढ़ें।
Putra Kameshti Yagya
Putra Kameshti Yagya
The Putra Kameshti Yagya is a powerful and sacred Vedic ritual performed to invoke divine blessings for progeny, fulfillment of desires, and overall family well-being. This yagya is primarily performed by couples who wish to be blessed with a child, as well as those who seek to attain spiritual growth, happiness, and prosperity in their family life. The ritual is deeply rooted in ancient scriptures and is known to bring positive changes, prosperity, and harmony into the lives of participants.
This yagya is performed to appease the planetary deities and invoke their blessings for fertility, health, and the well-being of the family. It is especially effective for those facing difficulties in conceiving or desiring to strengthen their family bond.
Benefits of Putra Kameshti Yagya
Progeny Blessings: Helps couples conceive and be blessed with children.
Desire Fulfillment: Fulfills personal and family-related desires, bringing peace and joy.
Spiritual Growth: Promotes spiritual growth, mental peace, and emotional stability.
Family Harmony: Strengthens family bonds, bringing love, understanding, and unity.
Removal of Obstacles: Removes obstacles and barriers in achieving desires and goals.
Improved Fertility: Improves fertility and health, enhancing the well-being of the couple.
How Is Putra Kameshti Yagya Performed?
Space Cleansing: The area is purified using sacred mantras and offerings to prepare for the sacred rituals.
Invocation of Gods: Chanting of sacred hymns and mantras to invoke the blessings of Lord Vishnu, Lord Shiva, and other deities for a healthy progeny.
Mantra Chanting: The main mantras of the Putra Kameshti Yagya are recited continuously to attract divine blessings for fertility and progeny.
Offerings to Fire: Offerings such as ghee, grains, and herbs are made into the sacred fire to energize the atmosphere.
Prayers for Family Welfare: Prayers are offered for overall family happiness, prosperity, and the health of future generations.
Prasad and Blessings: After completing the yagya, prasad (blessed offerings) is distributed to all participants, followed by the aarti to seek divine protection
वास्तु पूजा – संपूर्ण विधि
🪷 श्री गुरुदेव दत्त 🪷
💢 वास्तु पूजा – संपूर्ण विधि 💢
ये पूजा हर घर, दुकान, फैक्ट्री के लिए प्राण है।
1. वास्तु पूजा कब और कितने दिन?
मुख्य वास्तु शांति – 1 दिन की होती है – गृह प्रवेश के दिन।
पर शास्त्र में 3 प्रकार है
साधारण 1 दिन – नये घर में प्रवेश पर
मध्यम 3 दिन – जहाँ जमीन में दोष हो, बोरवेल गलत हो, कोई अशुभ घटना हुई हो
उत्तम 5 दिन तक – मंदिर, बड़ा मकान, फैक्ट्री, जहाँ तहखाना, कुआँ दबा हो
सबसे शुभ नक्षत्र उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, धनिष्ठा, शतभिषा – और मंगल-शनि छोड़कर कोई भी दिन।
समय सुबह 8 से 12
2. सामग्री
ईंट / शिला 5, वास्तु यंत्र तांबे का, नाग-नागिन चांदी के, सप्तधान्य (7 अनाज), गंगाजल, पंचगव्य, कलश 1, हवन सामग्री, लाल कपड़ा, कील 4 लोहे की
3. पूजा विधि – Step by Step
Step 1 – भूमि शोधन
जहाँ पूजा करनी है, गोबर से लीपें। फिर गंगाजल + गोमूत्र छिड़कें।
मंत्र ॐ वास्तु पुरुषाय नमः
Step 2 – वास्तु पुरुष का निर्माण
बीच में चावल से चौकोर बनाएं। उस पर वास्तु पुरुष की आकृति – सिर ईशान (उत्तर-पूर्व), पैर नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में।
Step 3 – कलश स्थापना
ईशान कोने में कलश रखें, उसमें सिक्का, सुपारी। कलश पर वास्तु यंत्र रखें।
Step 4 – 5 देव पूजा
- गणेश – विघ्न हरण
- वरुण – जल शुद्धि
- नवग्रह – 9 ग्रहों की शांति
- वास्तु पुरुष – मुख्य देव
- क्षेत्रपाल – जमीन के रक्षक
मंत्र – ॐ वास्तोष्पते प्रतिजानीह्यस्मान् स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥ ऋग्वेद का वास्तु मंत्र
Step 5 – हवन
108 आहुति – तिल + घी + जौ से ॐ वास्तु पुरुषाय स्वाहा
Step 6 – नींव में स्थापना (सबसे जरूरी)
एक छोटा गड्ढा आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) में खोदें। उसमें
👉तांबे का वास्तु यंत्र
👉चांदी के नाग-नागिन
👉7 अनाज
👉1 ईंट
रखकर ऊपर से सीमेंट कर दें। यही घर का प्राण-स्थापन है।
4. कितने दिन पूजा घर में करनी है?
वास्तु शांति 1 दिन ही होती है, पर उसके बाद
21 दिन तक रोज वास्तु पुरुष को धूप-दीपक दिखाएं
👉जहाँ नाग दबाए हैं वहाँ रोज 1 लोटा जल
👉1 साल तक उस जगह पर जूता-चप्पल न रखें
5. लाभ
👉घर में लड़ाई, बीमारी, पैसे का न रुकना बंद होता है
👉किराये वाला घर अपना बनता है
👉फैक्ट्री में मशीनरी नहीं टूटती
6. सावधानी
- वास्तु पूजा मंगल और शनिवार को न करें
- वास्तु यंत्र को लोहे पर न रखें, तांबे पर ही
- पूजा के दिन घर के सभी सदस्य उपस्थित रहें, सूतक में न करें
भाव वास्तु पूजा ईंट की पूजा नहीं, उस अदृश्य पुरुष की पूजा है जो हमारी जमीन पर लेटा है – उसे जगाकर कह रहे हैं “अब आप इस घर की रक्षा करो”
शुक्र — रिश्ते टूटने के बाद भी मन उसी व्यक्ति के पास क्यों लौटता है।
शुक्र — रिश्ते टूटने के बाद भी मन उसी व्यक्ति के पास क्यों लौटता है।
कभी कभी कोई व्यक्ति हमारी जिंदगी से चला जाता है लेकिन हमारे भीतर से नहीं जाता। बात खत्म हो जाती है लेकिन मन में बातचीत चलती रहती है। रिश्ता खत्म हो जाता है लेकिन इंतजार खत्म नहीं होता। फोन हाथ में आता है और अनजाने में उसी नाम को देखने का मन करता है। कोई पुरानी तस्वीर सामने आ जाती है तो आंखें नम हो जाती हैं। कोई गीत बजता है और लगता है जैसे वह इंसान अभी यहीं कहीं है। हम खुद से कहते हैं कि अब बहुत समय हो गया है फिर भी दिल मानता नहीं। सबसे अजीब बात यह होती है कि हम उस व्यक्ति को भूलना भी चाहते हैं और भीतर कहीं यह भी चाहते हैं कि वह वापस आए। आखिर ऐसा क्यों होता है। क्या यह केवल आदत है। क्या यह केवल मोह है। या कुछ रिश्ते सचमुच इतने गहरे होते हैं कि उनके टूट जाने के बाद भी उनका संबंध भीतर कहीं बना रहता है। ज्योतिष की कर्मिक दृष्टि से यही वह जगह है जहाँ शुक्र की कहानी शुरू होती है।
शुक्र केवल प्रेम का ग्रह नहीं है। शुक्र उस अनुभूति का भी ग्रह है जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहकर हमें अपने भीतर कुछ पूरा महसूस होता है। इसलिए जब कोई रिश्ता टूटता है तो हमेशा व्यक्ति ही नहीं जाता। उसके साथ हमारे जीवन का एक हिस्सा भी चला जाता है। जिस समय वह हमारे साथ था तब हम अपने आपको जिस रूप में देखते थे वह रूप भी उसके साथ जुड़ गया था। उसकी आवाज हमारी खुशी से जुड़ गई। उसका इंतजार हमारी दिनचर्या से जुड़ गया। उसकी मौजूदगी हमारी सुरक्षा से जुड़ गई। इसलिए रिश्ता टूटने के बाद मन केवल उस व्यक्ति को नहीं खोजता। वह उस अपने रूप को भी खोजता है जो उस व्यक्ति के साथ रहते हुए पैदा हुआ था। यही कारण है कि कुछ लोग वर्षों बाद भी भीतर से उसी व्यक्ति की ओर लौटते रहते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर मैं आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा। शायद क्योंकि कुछ संबंध केवल वर्तमान की घटना नहीं होते। वे हमारे भीतर बहुत पुरानी किसी स्मृति या संस्कार को छू देते हैं।
कर्मिक ज्योतिष में राहु और केतु को जन्म जन्मांतर की धुरी के रूप में देखा जाता है। पंचम भाव को पूर्व संस्कार और पूर्व पुण्य से जोड़ा जाता है। अष्टम भाव गहरे बंधन परिवर्तन और उन अनुभवों की ओर संकेत कर सकता है जो व्यक्ति को भीतर तक बदल देते हैं। द्वादश भाव त्याग और उस पकड़ को दिखा सकता है जिससे मुक्त होना सीखना पड़ता है। जब शुक्र का इन क्षेत्रों या ग्रहों से गहरा संबंध बनता है तब प्रेम की कहानी केवल आकर्षण तक सीमित नहीं रहती। वहां एक ऐसी अनुभूति दिखाई दे सकती है जिसमें व्यक्ति को लगता है कि यह रिश्ता नया होकर भी नया नहीं है। जैसे सामने वाले को पहली बार देखकर भी मन कह रहा हो कि मैं इसे पहले से जानता हूँ। जैसे उसकी आवाज में कोई पुरानी पहचान छिपी हो। जैसे उसके साथ कुछ अधूरा रह गया हो और मन बिना कारण उसी अधूरेपन को पूरा करना चाहता हो। इसे निश्चित रूप से पिछले जन्म का प्रमाण नहीं कहा जा सकता लेकिन कर्मिक ज्योतिष की भाषा में इसे पूर्व संस्कार की गहरी प्रतिध्वनि के रूप में समझा जा सकता है।
शायद इसी कारण कुछ रिश्ते जीवन में आते ही साधारण नहीं लगते। मुलाकात छोटी होती है लेकिन असर बहुत बड़ा होता है। साथ कम मिलता है लेकिन याद बहुत लंबे समय तक रहती है। कभी कभी दो लोग बहुत कम समय साथ रहते हैं फिर भी उनमें से कोई एक दूसरे के जीवन पर वर्षों तक छाया रहता है। वहीं कुछ रिश्ते वर्षों तक चलते हैं लेकिन भीतर कोई ऐसी गहराई पैदा नहीं होती। यह अंतर केवल समय से नहीं समझाया जा सकता। शुक्र जब किसी गहरे कर्मिक संकेत से जुड़ता है तब आकर्षण केवल शरीर का नहीं रहता। व्यक्ति के भीतर एक अजीब खिंचाव पैदा हो सकता है। सामने वाला दूर चला जाए तो मन उसे छोड़ने के बजाय और ज्यादा महसूस करने लगता है। आप उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि यह रिश्ता खत्म हो गया लेकिन हृदय कहता है कि कहानी अभी पूरी नहीं हुई। शायद इसी को लोग आत्मिक कनेक्शन कहते हैं। और शायद इसी कारण कुछ प्रेम कहानियां पूरी होकर भी पूरी नहीं लगतीं।
लेकिन यहां एक बहुत सुंदर और कठिन बात समझनी होगी। किसी व्यक्ति का आपकी जिंदगी में लौटना हमेशा जरूरी नहीं होता। कभी कभी उसका लौटना किसी बाहरी रूप में नहीं बल्कि आपके भीतर होता है। उसकी याद आपको बदलती है। उसके साथ बिताया समय आपको प्रेम समझाता है। उसका जाना आपको अपने भीतर की कमजोरी दिखाता है। उसकी चुप्पी आपको अपनी अपेक्षाओं से मिलाती है। उसका प्रेम आपको बताता है कि आप कितना गहरा महसूस कर सकते हैं। उसका दूर जाना आपको बताता है कि आपके भीतर कितना धैर्य है। इसलिए कर्मिक संबंध का अर्थ केवल यह नहीं कि दोनों लोग फिर से मिलेंगे। इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उस संबंध ने आपके भीतर कोई ऐसा अध्याय खोल दिया जिसे इस जन्म में पूरा समझना था। शायद इसी वजह से कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे भीतर अपना काम करते रहते हैं।
शुक्र की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि प्रेम और आसक्ति के बीच का अंतर समझा जाए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर गहरे प्रेम को तुरंत छोड़ देना चाहिए। नहीं। कुछ संबंधों को समय चाहिए। कुछ रिश्तों को संवाद चाहिए। कुछ को क्षमा चाहिए। कुछ को प्रतीक्षा चाहिए। और कुछ संबंध ऐसे भी होते हैं जिनकी कहानी परिस्थितियों के बदलने के बाद फिर किसी दूसरे मोड़ पर सामने आ सकती है। कर्म का रहस्य हम पूरी तरह नहीं जानते। इसलिए किसी गहरे संबंध को केवल इसलिए खारिज कर देना कि वह कठिन है भी उचित नहीं। यदि हृदय बार बार उसी व्यक्ति की ओर लौटता है तो पहले अपने भीतर यह देखना चाहिए कि वह लौटना किस कारण है। क्या वहां प्रेम है। क्या वहां अधूरापन है। क्या वहां कोई अनकहा सत्य है। क्या कोई क्षमा बाकी है। क्या कोई वचन अधूरा है। या क्या उस व्यक्ति के माध्यम से जीवन हमें अपने ही किसी गहरे हिस्से से मिलवा रहा है। उत्तर हर व्यक्ति की कुंडली और जीवन की परिस्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।
और कभी कभी सबसे दर्दनाक बात यह होती है कि दोनों लोग एक दूसरे को प्रेम करते हैं फिर भी परिस्थितियां उन्हें साथ नहीं रहने देतीं। समय सही नहीं होता। परिवार बीच में आ जाते हैं। दूरी आ जाती है। अहंकार आ जाता है। गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं। कोई एक डर जाता है। कोई एक चुप हो जाता है। और फिर दोनों अपनी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं लेकिन भीतर एक जगह खाली रह जाती है। वर्षों बाद अचानक कोई स्मृति आती है और हृदय फिर उसी जगह खड़ा हो जाता है जहाँ कहानी अधूरी रह गई थी। शायद यही वह क्षण है जहाँ मनुष्य समझता है कि प्रेम हमेशा प्राप्ति का नाम नहीं है। कभी कभी प्रेम वह अनुभव है जो हमें हमारी आत्मा की गहराई तक ले जाता है। कोई व्यक्ति हमारे साथ रहे या न रहे यह जीवन के हाथ में हो सकता है लेकिन उसने हमारे भीतर जो प्रेम जगा दिया वह हमेशा हमारे साथ रह सकता है।
इसलिए अगर आपका मन आज भी किसी ऐसे व्यक्ति के पास लौटता है जिससे आपका रिश्ता टूट चुका है तो अपने मन को तुरंत गलत मत कहिए। यह जरूरी नहीं कि आप कमजोर हैं। यह भी जरूरी नहीं कि आप केवल भ्रम में हैं। हो सकता है आपके भीतर कोई पुरानी स्मृति जीवित हो। हो सकता है कोई अधूरा भाव हो। हो सकता है उस व्यक्ति ने आपके जीवन में ऐसा संस्कार छोड़ दिया हो जो अभी समझ में आना बाकी है। और कर्मिक ज्योतिष की भाषा में हो सकता है कि वह संबंध आपके लिए किसी पुराने अध्याय की प्रतिध्वनि हो।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि आपको अपने जीवन को रोक देना चाहिए। प्रेम को महसूस करना और अपने जीवन को जीना एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। कभी कभी मन उसी व्यक्ति के पास लौटता रहेगा और फिर भी जीवन आगे बढ़ता रहेगा। समय के साथ उस लौटने का अर्थ बदल सकता है। आज जो दर्द है वही कल समझ बन सकता है।
शायद इसीलिए कुछ लोग हमारी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आते। वे आते हैं और हमारे भीतर कुछ ऐसा जगा जाते हैं जो पहले सोया हुआ था। वे हमें बताते हैं कि हम कितना प्रेम कर सकते हैं। कितना इंतजार कर सकते हैं। कितना टूट सकते हैं। और टूटने के बाद भी हमारे भीतर प्रेम बचा रह सकता है। शायद यही कर्म की सबसे गहरी सुंदरता है। हमें हर जन्म की पूरी कहानी याद नहीं रहती लेकिन कुछ भाव बिना नाम के हमारे साथ चलते रहते हैं। किसी चेहरे से अचानक अपनापन। किसी आवाज से अजीब शांति। किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसका मन में बने रहना। इन सबको हम निश्चित रूप से पूर्व जन्म नहीं कह सकते लेकिन इनके भीतर छिपे अर्थ को महसूस जरूर कर सकते हैं।
और शायद किसी दिन वह व्यक्ति फिर आपके सामने आए। शायद नहीं आए। यह भविष्य कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता। लेकिन यदि वह रिश्ता आपके जीवन में सचमुच किसी गहरे कर्मिक पाठ की तरह आया था तो उसका उद्देश्य केवल मिलना नहीं था। उसका उद्देश्य आपको बदलना भी हो सकता है। इसलिए उस प्रेम को केवल अपने दर्द के रूप में मत देखिए। उसे अपनी आत्मा के एक अध्याय की तरह देखिए। जिसने आपको रुलाया वही आपको गहराई दे गया। जिसने आपको इंतजार कराया उसने आपको धैर्य सिखाया। जिसने आपको छोड़ा उसने आपको अपने भीतर लौटना सिखाया। और जिसने आपको प्रेम दिया उसने आपको यह बताया कि आपका हृदय कितना विशाल है।
शुक्र शायद इसी रहस्य का ग्रह है। वह केवल यह नहीं बताता कि आपके जीवन में प्रेम आएगा या नहीं। वह यह भी दिखाता है कि प्रेम आपके भीतर क्या जगाने आया है।
और कभी कभी जिस व्यक्ति से रिश्ता टूट जाता है उसके साथ संबंध बाहर से समाप्त हो जाता है लेकिन भीतर उसकी कहानी चलती रहती है।शायद इसलिए नहीं कि आप कमजोर हैं।
शायद इसलिए कि कुछ रिश्ते समय से नहीं मापे जाते।
कुछ रिश्ते अपने भीतर छोड़ी हुई छाप से मापे जाते हैं।
और कर्मिक ज्योतिष की दृष्टि से शायद कुछ प्रेम ऐसे भी होते हैं जिनकी शुरुआत इस जन्म में दिखाई देती है लेकिन उनकी जड़ें किसी बहुत पुराने संस्कार तक जाती हुई महसूस होती हैं।
कौन जानता है कितने जन्म पहले कौन किससे क्या कहकर बिछड़ा था।कौन जानता है कौन सा वचन अधूरा रह गया था।
कौन जानता है कौन सा प्रेम समय के पार भी अपनी पहचान बचाकर बैठा है।
लेकिन इतना जरूर है कि जब कोई व्यक्ति बिना सामने हुए भी आपके भीतर इतनी गहराई से मौजूद हो तो उस भावना को समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।
क्योंकि हो सकता है वह केवल किसी इंसान की याद न हो।
हो सकता है वह आपकी आत्मा के किसी पुराने अध्याय की दस्तक हो।
शुक्र सूत्रम्
सूत्र १
शुक्र जहाँ बैठता है वहाँ सुख की इच्छा नहीं, सुख की भूख दिखाई देती है।
सूत्र २
शुक्र जिस ग्रह से जुड़ता है, प्रेम उसी ग्रह का रंग और कर्म पहन लेता है।
सूत्र ३
राहु से जुड़ा शुक्र कई बार व्यक्ति से नहीं, उसकी बनाई हुई कल्पना से प्रेम करवाता है।
सूत्र ४
केतु से जुड़ा शुक्र प्रेम के बीच भी एक ऐसी दूरी रखता है जिसे मन स्वयं नहीं समझ पाता।
सूत्र ५
अष्टम से जुड़ा शुक्र सुख नहीं छिपाता, सुख के पीछे छिपी आसक्ति को खोल देता है।
सूत्र ६
द्वादश से जुड़ा शुक्र पूछता है—प्रेम में तुमने पाया कितना और स्वयं को खोया कितना?
सूत्र ७
पंचम से जुड़ा शुक्र आकर्षण देता है, लेकिन अष्टम से जुड़ते ही आकर्षण अनुभव बन जाता है।
सूत्र ८
शुक्र की परीक्षा सुख मिलने में नहीं, सुख मिलने के बाद उससे मुक्त रहने में है।
सूत्र ९
जिसे आँखें सुंदर समझती हैं वह जरूरी नहीं कि जीवन के लिए सही हो। शुक्र आकर्षण दिखाता है, विवेक चयन करता है।
सूत्र १०
शुक्र का अंतिम रहस्य यही है—सच्चा प्रेम वह है जिसमें प्रेम रहे, लेकिन अधिकार समाप्त हो जाए।

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